अब मौत का डर कैसा...

 

अब मौत का डर कैसा

अब मौत का डर कैसा,
जब ज़िंदगी ही सवाल बन गई है।
हर उम्मीद धूल में बिखरकर,
एक अधूरी मिसाल बन गई है।

हमारे सपनों का मज़ाक उड़ा,
हमारी ख़ामोशी नीलाम हुई।
जो कल तक मंज़िल कहते थे,
आज वही राहें गुमनाम हुईं।

हम जीते-जी बुत बन बैठे,
चेहरे पर मुस्कानों का पहरा है।
भीतर ज्वालामुखी जलता है,
बाहर बस ख़ामोशी का सवेरा है।

लेकिन सुन लो ऐ वक़्त!
हम राख नहीं, अंगार हैं।
जितना दबाओगे हमें,
उतना ही प्रचंड हुंकार हैं।

तूफ़ानों से डरकर जो रुक जाएँ,
हम वो कश्तियाँ नहीं।
गिरकर फिर न उठ सकें,
हम ऐसी हस्तियाँ नहीं।

हमारे हिस्से की हर ठोकर,
हमारी ताक़त बन जाएगी।
आज जो हँसते हैं हम पर,
कल वही कहानी गाएगी।

हमने हार को हथियार बनाया है,
आँसुओं को तलवार बनाया है।
जिस दर्द ने तोड़ना चाहा हमें,
उसी दर्द को आधार बनाया है।

अब मंज़िल दूर सही,
पर क़दम नहीं रुकेंगे।
जब तक साँसों में आग बचेगी,
हम हर अँधेरे से लड़ेंगे।

क्योंकि इंसान की पहचान
उसकी आसान राह नहीं होती;
इतिहास उन्हीं का लिखा जाता है,
जिनकी रगों में हार नहीं होती।

तो आओ, फिर से उठें—
अपनी तक़दीर ख़ुद लिखें।
जो सपना कभी उपहास बना था,
उसे आने वाले कल की तक़दीर लिखें।

अब मौत का डर कैसा—
डर तो उस दिन होगा,
जिस दिन बिना लड़े
हम अपनी उम्मीदों से हार जाएँगे।

हम नहीं झुकेंगे।
हम नहीं रुकेंगे।
हम नहीं बुझेंगे।
जब तक सीने में एक भी साँस है,
हम अपने सपनों की लौ बनकर
हर अँधेरे को चुनौती देते रहेंगे।

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