फिर मिले हम
फिर मिले हम
बरसों बाद
जब तुम अचानक सामने आए,
तो लगा जैसे
वक़्त ने अपनी रफ़्तार
एक पल के लिए रोक दी हो।
वही आँखें...
जिनमें कभी मेरा आसमान बसता था,
वही मुस्कान...
जो मेरी हर उदासी की सुबह हुआ करती थी।
हम दोनों मुस्कुराए,
मगर लफ़्ज़ कहीं खो गए।
कुछ रिश्ते
बातों से नहीं,
ख़ामोशियों से अपना हाल कह देते हैं।
तुमने पूछा—
"कैसे हो?"
मैंने कहा—
"ठीक हूँ..."
पर दिल जानता था,
यह जवाब उतना ही अधूरा था
जितनी हमारी अधूरी कहानी।
वक़्त ने बहुत कुछ बदल दिया था—
चेहरों पर परिपक्वता,
बालों में कुछ सफ़ेदी,
ज़िम्मेदारियों का बोझ...
मगर एक चीज़ नहीं बदली—
तुम्हें देखकर
मेरे दिल की धड़कनों का बेवजह तेज़ हो जाना।
उस शाम
हमने पुराने दिनों को
फिर से जी लिया,
जैसे पतझड़ के बाद
किसी सूखी शाख़ पर
अचानक एक फूल खिल उठा हो।
जाते-जाते
तुमने बस इतना कहा—
"अब इतनी देर मत लगाना मिलने में..."
और मैंने मुस्कुराकर सोचा—
कुछ लोग उम्र भर नहीं बदलते,
वे सिर्फ़ समय की किताब में
एक लंबे विराम के बाद
फिर से पढ़े जाने वाले
सबसे ख़ूबसूरत अध्याय बन जाते हैं।
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