अब बस बहुत हुआ
अब बस बहुत हुआ...
अब बस बहुत हुआ,
अब और नहीं सहेंगे।
अन्याय की हर दीवार से,
सीना तानकर कहेंगे।
डर की हर बेड़ी टूटेगी,
झूठ का हर सिंहासन डोलेगा।
जिसने मानवता को बाँटा है,
वह अपने ही बोझ से रोएगा।
मार दो—यदि यही तुम्हारा उत्तर है,
स्वीकार है हमें वह प्रहार भी।
पर याद रहे,
विचारों का रक्त कभी नहीं बहता,
वह बन जाता है अगली पीढ़ी की चिंगारी।
अब न मरेंगे बार-बार,
हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा नहीं।
जीएँगे पूरे स्वाभिमान से,
झुकेंगे किसी भय के आगे नहीं।
हमारे हाथों में पत्थर नहीं,
सत्य की मशाल होगी।
हमारे शब्दों में नफ़रत नहीं,
परिवर्तन की हुंकार होगी।
जो आँधियाँ हमें डराती थीं,
अब वही हमारी राह बनेंगी।
जो ज़ंजीरें हमें बाँधती थीं,
अब वही विजय की धुन कहेंगी।
हम लड़ेंगे—
हथियारों से नहीं,
अपने चरित्र की शक्ति से।
हम जीतेंगे—
घृणा से नहीं,
अपने अटूट साहस की भक्ति से।
हर गिरती हुई उम्मीद को,
हम फिर से आकाश देंगे।
हर टूटे हुए इंसान को,
जीने का विश्वास देंगे।
क्रांति केवल तलवार नहीं,
क्रांति एक जागा हुआ विवेक है।
जब जन-जन अन्याय के विरुद्ध खड़ा हो जाए,
वहीं सच्चे परिवर्तन का आरंभ है।
तो उठो,
अपने भीतर के सूर्य को पहचानो।
डर के अंधेरों से निकलकर,
अपने अस्तित्व का सम्मान जानो।
अब बस बहुत हुआ—
इतिहास नया लिखना होगा।
हर अन्याय के सामने
सत्य का दीपक रखना होगा।
यदि संघर्ष ही भाग्य लिखा है,
तो मुस्कुराकर उसे स्वीकार करेंगे।
पर याद रहे—
हम टूट सकते हैं,
बिक नहीं सकते।
अब बस बहुत हुआ…
अब नहीं करेंगे अन्याय का समझौता।
जीवन एक ही बार मिलता है—
उसे झुककर नहीं,
स्वाभिमान के साथ जिएँगे।
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