कल मिलने आना,
रोज़ की तरह।
पर चाय पर नहीं,
चिता पर।
जहाँ मैं
मातृभूमि के लिए
अपनी अंतिम आहुति दे रहा होऊँ।
आना,
पर आँसू लेकर नहीं—
तिरंगा लेकर।
क्योंकि किसी का अंत नहीं,
राष्ट्र के प्रति समर्पण का संकल्प अमर होता है।
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