अधिकार से पहले चेतना
अधिकार से पहले चेतना...
अधिकार मिले हैं?
अच्छी बात है।
पर क्या चेतना भी मिली है?
क्या ज़िम्मेदारी भी जागी है?
बिना शिक्षा के अधिकार,
बिना संस्कार की शक्ति—
कभी-कभी न्याय नहीं,
अराजकता को जन्म देती है।
कानून तुम्हें बचाने के लिए है,
किसी पर चढ़ बैठने के लिए नहीं।
संविधान तुम्हें गरिमा देता है,
दूसरों की गरिमा छीनने का अधिकार नहीं।
जो शक्ति विवेक के बिना मिले,
वह हथियार बन जाती है।
जो अधिकार कर्तव्य से कट जाए,
वह अहंकार बन जाता है।
हर घटना के बाद
नया कानून बना देना
सबसे आसान राजनीति है।
सबसे कठिन काम है—
बच्चे को इंसान बनाना,
विद्यालय को विचार बनाना,
परिवार को संस्कार बनाना,
समाज को ज़िम्मेदारी सिखाना।
काग़ज़ पर लिखे नियम
चरित्र नहीं गढ़ते।
डर से रुका अपराध
मौका मिलते ही लौट आता है।
स्थायी बदलाव
अदालतों में नहीं जन्म लेता,
वह कक्षा में जन्म लेता है।
वह घर की चौखट पर पलता है।
वह समाज की चेतना में साँस लेता है।
इसलिए
सिर्फ़ कानून मत बनाओ,
इंसान बनाओ।
सिर्फ़ अधिकार मत बाँटो,
कर्तव्य भी जगाओ।
सिर्फ़ दंड मत बढ़ाओ,
चरित्र भी ऊँचा उठाओ।
याद रखो—
जिस समाज में
अधिकार, कर्तव्य से बड़े हो जाएँ,
और शक्ति, विवेक से आगे निकल जाए—
वहाँ न्याय कमज़ोर पड़ जाता है।
क्रांति कानूनों से नहीं,
जागृत नागरिकों से आती है।
और वही राष्ट्र सबसे शक्तिशाली होता है,
जहाँ अधिकार और ज़िम्मेदारी
एक साथ चलते हैं।
रूपेश रंजन
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