उस गुलाबी गुड़हल के नाम, जो आज भी तुम्हारी यादों सा खिला है...

 

**उस गुलाबी गुड़हल के नाम, जो आज भी तुम्हारी यादों सा खिला है

इस गुलाबी गुड़हल को देख,
आज फिर तुम्हारी याद चली आई।
प्रकृति ने मुस्कुराकर पूछा—
"क्या अब भी कोई अधूरी कहानी बाकी है?"

मैंने हवा से बस इतना कहा—
हाँ...
एक प्रेम अब भी पत्तियों पर ओस बनकर ठहरा है,
जिसे समय की धूप भी सुखा नहीं सकी।

तुम चली गईं,
पर तुम्हारे होने की खुशबू
अब भी मेरे मन के उपवन में महकती है।
जैसे यह फूल
हर सुबह बिना शिकायत के खिल उठता है,
वैसे ही मेरा प्रेम
हर दिन तुम्हें चुपचाप आशीर्वाद देता है।

न कोई शिकायत,
न कोई दोषारोपण,
बस एक मौन प्रार्थना—
जहाँ भी रहो,
तुम्हारे जीवन में कभी पतझड़ न आए।

मैंने प्रेम को खोया नहीं,
उसे अपने भीतर रोप दिया है।
अब वह एक वृक्ष है,
जिसकी जड़ों में तुम्हारी स्मृतियाँ हैं,
तने में मेरा धैर्य,
और शाखाओं पर अनकहे शब्दों के अनगिनत पंछी।

देखो,
यह फूल भी तो जानता है—
सौंदर्य का अर्थ किसी का हो जाना नहीं,
बल्कि किसी की स्मृति में
सदा खिलते रहना है।

यदि कभी
तुम्हारी नज़र किसी गुलाबी गुड़हल पर ठहर जाए,
तो समझ लेना—
कहीं कोई आज भी
तुम्हारे नाम की खामोश दुआ लिख रहा है।

मैंने तुम्हें भुलाने की कोशिश नहीं की,
मैंने तुम्हें सम्मान देना सीख लिया।
क्योंकि सच्चा प्रेम
अधिकार नहीं माँगता,
वह तो बस
दूर रहकर भी
किसी के सुख के लिए प्रार्थना करता है।

और यदि अगला जन्म सचमुच होता है,
तो मैं ईश्वर से इतना ही माँगूँगा—
इस बार तुम्हारा साथ नहीं,
तुम्हारा विश्वास देना।
ताकि यह प्रेम
किसी बिछड़न की कहानी नहीं,
दो आत्माओं की पूर्ण कविता बन सके।

— तुम्हारी स्मृतियों के नाम,
जो आज भी मेरे जीवन के उपवन में
इस गुलाबी फूल की तरह शांत, कोमल और अमर हैं।

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