मैं नदी हूँ...
मैं नदी हूँ
मैं नदी हूँ, किनारों को बाँध नहीं सकता,
किसी की मुट्ठी में ठहरने का वादा नहीं करता।
मेरा धर्म बहना है, रुकना नहीं,
हर मोड़ पर स्वयं को खोना नहीं।
जो साथ चले, उसकी प्यास बुझा दूँ,
पर किसी की ज़िद पर अपनी दिशा बदलूँ—इतना भी नहीं।
मैं पर्वत की गोद से निकला एक विश्वास हूँ,
हर पत्थर से लड़ना मेरा इतिहास नहीं।
किनारे मेरा सहारा हैं, मेरी कैद नहीं,
उनकी सीमाएँ मेरी पहचान नहीं।
मैं तो उस समंदर की तलाश में हूँ,
जो मेरी हर थकान को अपना विस्तार दे।
रोक लोगे तो झील बन जाऊँगा,
छोड़ दोगे तो जीवन लिख जाऊँगा।
मैं नदी हूँ—मेरा प्रेम बहना है,
किसी को बाँधना नहीं, बस अपना रास्ता कहना है।
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