आज़ादी की ग़ुलामी...
आज़ादी की ग़ुलामी
बड़ी ग़ुलाम थी वह,
धीरे-धीरे मैंने उसे आज़ाद किया।
हर बंधन की गाँठ खोली,
हर डर की दीवार गिराई,
हर कैद का दरवाज़ा खोला।
फिर एक दिन वह सचमुच आज़ाद हो गई—
बिलकुल आज़ाद।
मगर अजीब है समय का व्यंग्य,
कि जब आज़ादी ने सारी सीमाएँ तोड़ दीं,
तो वही आज़ादी
एक नई ग़ुलामी बन गई।
अब वह किसी इंसान की नहीं,
अपनी मनमर्ज़ियों की क़ैदी है।
इच्छाओं की बेड़ियों में जकड़ी हुई,
स्वच्छंदता के बोझ तले दबी हुई।
शायद हर आज़ादी
मर्यादा का साथ माँगती है,
क्योंकि मर्यादा से रहित स्वतंत्रता
अक्सर
आज़ादी की ग़ुलामी बन जाती है।
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