साँझ की विदाई...
साँझ की विदाई
यह साँझ भी कितनी अजीब है—
आसमान ने नीले आँचल में
कुछ अधूरे ख़्वाब समेट रखे हैं,
और मैं...
तुम्हारी यादों का आख़िरी मुसाफ़िर बनकर
इस राह से गुज़र रहा हूँ।
बादलों की चुप्पी में
तुम्हारी आवाज़ अब भी सुनाई देती है,
जैसे हर हवा कह रही हो—
"रुक जाओ..."
पर वक़्त की उँगली पकड़कर
मुझे फिर भी आगे बढ़ना है।
देखो,
डूबती शाम ने सूरज को विदा तो कर दिया,
मगर उसकी लालिमा
अब भी क्षितिज से लिपटी हुई है।
शायद मोहब्बत भी ऐसी ही होती है—
लोग बिछड़ जाते हैं,
पर एहसास कभी नहीं बिछड़ते।
आज तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ,
मगर अपने साथ
तुम्हारी हँसी की खुशबू,
तुम्हारी आँखों की नमी,
और उन ख़ामोश लम्हों की धड़कनें
हमेशा के लिए ले जा रहा हूँ।
अगर कभी
इसी नीले आसमान के नीचे
यह शाम तुम्हें मेरी याद दिलाए,
तो मुस्कुरा देना।
समझ लेना,
कहीं दूर कोई मुसाफ़िर
अब भी तुम्हारी सलामती की दुआ कर रहा है।
अलविदा, मेरी मोहब्बत।
यह जुदाई अंत नहीं,
बस हमारी कहानी का
एक ख़ामोश मोड़ है।
शायद किसी और शाम,
किसी और आसमान के नीचे,
हम फिर मिलें—
और इस बार
विदाई का कोई मौसम न हो।
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