काश तुमने मेरे मन का बादल देखा होता

 

काश तुमने मेरे मन का बादल देखा होता

काश तुमने मेरे मन का बादल देखा होता,
तो शायद मेरे मौन का अर्थ भी समझा होता।
जो आँखों से कभी बरसा नहीं,
वह भीतर हर पल सावन बनकर रोता रहा।

तुमने मुस्कानों की धूप ही देखी,
पर भीतर की घनी घटाएँ नहीं।
तुमने शब्दों की सतह पढ़ी,
पर आत्मा की गहराइयाँ नहीं।

मेरे मन के आकाश में
कितनी अधूरी बिजली कौंधती रही,
कितनी इच्छाएँ बिना वर्षा के
रेत पर ही बिखरती रहीं।

काश तुमने उन बादलों को छुआ होता,
जो हर रात मेरी पलकों पर उतर आते थे।
तब जान पाते कि कुछ आँसू
आँखों से नहीं, आत्मा से बहते हैं।

मैंने अपने दुःख को
कभी किसी पर बोझ नहीं बनने दिया।
हर टूटन को मुस्कुराहट की चादर ओढ़ाकर
समय के हवाले करता रहा।

तुम समझते रहे मैं मजबूत हूँ,
पर सच यह था—
मैं हर दिन अपने ही भीतर
थोड़ा-थोड़ा बिखरता रहा।

प्रेम शिकायत नहीं माँगता,
सिर्फ़ समझे जाने की एक छोटी-सी इच्छा रखता है।
काश तुमने मेरे मौन में छिपी पुकार सुनी होती,
तो शायद दूरी इतनी गहरी न होती।

अब मेरे मन के बादल
बरसना भी सीख गए हैं और थमना भी।
उन्होंने सिखा दिया है कि
हर आकाश को अपना मौसम स्वयं बदलना पड़ता है।

फिर भी एक अधूरी प्रार्थना
आज भी हवाओं में तैरती है—
काश तुमने मेरे मन का बादल देखा होता,
तो शायद तुम मुझे खोने से पहले पहचान लिया होता।

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