मसला यही है...
मसला यही है...
हम तो रंग दें पन्नों को
अपने ख़ून की स्याही से,
मसला यह नहीं कि लिखेंगे या नहीं,
मसला यह है कि पढ़ेगा कौन।
हम तो कह दें
दिल की हर अनकही दास्ताँ,
मसला यह नहीं कि बोलेंगे या नहीं,
मसला यह है कि सुनेगा कौन।
यह दिल तो
हर पल जलता रहता है,
मसला यह नहीं कि दर्द है या नहीं,
मसला यह है कि
इस आग को बुझाएगा कौन।
दर्द तो बेहिसाब है, साहब,
हर मुस्कान के पीछे
एक टूटा हुआ संसार छिपा है।
मसला यह नहीं कि ज़ख्म हैं या नहीं,
मसला यह है कि
उन्हें समझेगा कौन।
आप कहें तो
हम जान भी दे दें,
मगर एक सवाल फिर भी बाकी रहेगा—
हमारे जाने के बाद
सच्चे दिल से रोएगा कौन?
ज़िंदगी की सबसे बड़ी तन्हाई
मौत नहीं होती,
बल्कि यह एहसास होता है कि
हमारी ख़ामोशियों को भी
महसूस करेगा कौन,
और हमारी कहानी को
अपना समझकर पढ़ेगा कौन।
रूपेश रंजन
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