मैं समंदर हूँ
मैं समंदर हूँ...
मैं समंदर हूँ, हर नदी की बेचैनी नहीं ओढ़ सकता,
हर किनारे की प्यास को अपनी नियति नहीं जोड़ सकता।
जो मुझ तक पहुँचे, उसे अपनी बाँहों में समेट लेता हूँ,
पर हर भटकती धारा के पीछे उम्र नहीं मोड़ सकता।
मेरा धैर्य गहरा है, मेरी ख़ामोशी अथाह है,
मैं हर छोटी लहर पर अपना संतुलन नहीं तोड़ सकता।
जिसे ठहरना हो, वह मेरी गहराइयों में उतर आए,
मैं हर पल बदलती चाहतों का सफ़र नहीं हो सकता।
मैंने तूफ़ानों से दोस्ती की है, हवाओं से समझौते नहीं,
इसलिए हर शिकायत पर अपना अस्तित्व नहीं छोड़ सकता।
जो सच में मेरा है, वह लौटकर यहीं आएगा,
मैं हर बहती नदी की चिंता में ख़ुद को नहीं खो सकता।
मैं समंदर हूँ—विशालता ही मेरी पहचान है,
हर नदी से प्रेम करूँ, यह मेरा स्वभाव नहीं हो सकता।
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