मैंने तो कश्तियाँ बनाई थी…
मैंने तो कश्तियाँ बनाई थी…
तुम संभाल नहीं पाए…
समंदर में जा मिले…
मैंने तो तुम्हारे प्यार में
बनाये थे…
कितना दर्द होता है जब अपना,
जिसे मानो…
वो किसी और का हो जाये…
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दे दो न दर्द…
दे दो न दर्द…
वो मुलाक़ात अभी भी बाकी है,
तुम छोड़ के जाओ…
और हम छूट न पाएँ।
कुछ अधूरी-सी बातें हैं,
कुछ अनकहे से एहसास हैं,
तुम दूर होकर भी मेरे हो,
और हम तुमसे दूर न हो पाएँ।
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बस एक शिकायत रह गई—
जब हमें तुम्हें चुनना था,
हमने बिना सोचे तुम्हें चुना…
तुम भी कुछ चुन लेतीं—
मेरे लिए,
मुझे भी…
कभी अपने लिए चुन लेतीं।
Rupesh Ranjan
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