वो कभी सामने आती है...
वो कभी सामने आती है,
कभी छुप जाती है,जाने कैसी है वो,
हर बार मुझे
और उलझा जाती है।
जब सामने होती है,
तो आँखें ठहर जाती हैं,
जब छुप जाती है,
तो वही आँखें
उसे ढूँढ़ने लगती हैं।
मैं उसे देखना चाहता हूँ,
वो नज़रें चुरा लेती है,
मैं कुछ कहना चाहता हूँ,
वो मुस्कुराकर
बात बदल देती है।
कभी लगता है
वो भी कुछ कहना चाहती है,
कभी लगता है
मैं ही उसकी खामोशी में
अपने अर्थ खोज रहा हूँ।
वो सामने आती है
तो दुनिया थोड़ी सुंदर लगती है,
वो ओझल होती है
तो वही दुनिया
कुछ खाली-सी लगती है।
न जाने यह कैसी दूरी है—
कि वो मुझसे दूर होकर भी
मेरे सबसे करीब रहती है।
मैंने कई बार सोचा
उससे पूछूँ—
“तुम यूँ सामने आकर
फिर क्यों छुप जाती हो?”
फिर डर लगा,
कहीं उसने सच कह दिया
तो मेरी सारी कविताएँ
खत्म न हो जाएँ।
इसलिए आज भी
मैं चुप हूँ,
वो कभी सामने आती है,
कभी छुप जाती है—
और मैं हर बार
उसे थोड़ा और
चाहने लगता हूँ।
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