प्रतीक्षालय में एक दिन

 

प्रतीक्षालय में एक दिन

— मुज़फ़्फ़रपुर जंक्शन की एक छोटी-सी यात्रा और जीवन का एक बड़ा दृश्य

मुज़फ़्फ़रपुर जंक्शन पहुँचा तो घड़ी शायद उस समय की ओर बढ़ रही थी, जब यात्रियों की बेचैनी धीरे-धीरे बढ़ने लगती है। मेरी ट्रेन दोपहर 12:30 बजे की थी। अभी कुछ समय था। यात्रा में प्रतीक्षा भी यात्रा का ही एक हिस्सा होती है—कभी प्लेटफ़ॉर्म पर, कभी बेंच पर, कभी किसी चाय की दुकान के सामने और कभी किसी प्रतीक्षालय में।

मैंने सोचा, ट्रेन आने तक प्रतीक्षालय में बैठ जाता हूँ।

मैं सामान्य प्रतीक्षालय की ओर बढ़ा।

लेकिन वहाँ पहुँचकर लगा कि मैं किसी प्रतीक्षालय में नहीं, बल्कि बरसात और भवन के बीच चल रही एक छोटी-सी लड़ाई के बीच पहुँच गया हूँ।

छत टपक रही थी।

बहुत तेज़।

कहीं से पानी बूँदों में नहीं, लगभग धार की तरह नीचे आ रहा था। फर्श पर जगह-जगह पानी जमा था। जिस जगह यात्रियों को बैठना था, वहाँ पानी अपना अधिकार जमा चुका था। लोग सूखी जगह तलाश रहे थे, जैसे किसी बड़े संकट के बीच थोड़ी-सी सुरक्षित जमीन खोज रहे हों।

किसी ने अपना सामान ऊँचा उठा रखा था।

कोई दीवार के किनारे खड़ा था।

कोई अपने पैरों को पानी से बचा रहा था।

कुछ लोग शायद इस दृश्य के इतने अभ्यस्त हो चुके थे कि उन्हें इसमें कोई विशेष असामान्यता दिखाई ही नहीं दे रही थी।

मैं कुछ क्षण वहीं खड़ा रहा।

मन में आया—क्या यहाँ बैठना संभव है?

फिर मैंने सोचा कि शायद एसी प्रतीक्षालय में स्थिति बेहतर होगी।

मैं वहाँ चला गया।

वहाँ पहुँचा तो दृश्य थोड़ा बदला हुआ था, लेकिन पूरी तरह नहीं।

यहाँ भी छत रिस रही थी।

हाँ, पानी कुछ कम था।

लेकिन पानी तो पानी था।

वह ऊपर से नीचे आ रहा था और नीचे से कोई उसे रोकने की कोशिश कर रहा था।

एक जगह बाल्टी रखी थी।

दूसरी जगह एक डिब्बा।

छत और फर्श के बीच पानी का एक छोटा-सा संवाद चल रहा था—ऊपर से पानी गिर रहा था और नीचे रखे पात्र उसे चुपचाप अपने भीतर समेट रहे थे।

मैंने उस दृश्य को देखा और मन ही मन मुस्कुराया।

यह भी कैसी व्यवस्था है!

जहाँ यात्रियों को आराम मिलना चाहिए, वहाँ बाल्टियाँ आराम कर रही थीं।

जहाँ छत को यात्रियों को बारिश से बचाना चाहिए, वहाँ छत स्वयं पानी का रास्ता बन गई थी।

और जहाँ शिकायत होनी चाहिए थी, वहाँ लोग चुपचाप अपने लिए सूखी जगह तलाश रहे थे।

मैंने आखिरकार एक साफ और सूखी जगह खोज ली।

बैठ गया।

मेरी ट्रेन आने में अभी समय था।

मैंने अपना सामान पास रखा और प्रतीक्षालय के वातावरण को देखने लगा।

यात्रा में कभी-कभी स्टेशन भी किताब की तरह खुल जाते हैं।

बस पढ़ने के लिए थोड़ा धैर्य चाहिए।

कुछ देर बाद एक भिखारिन अंदर आई।

वह धीरे-धीरे यात्रियों के बीच घूमने लगी।

उसकी आवाज़ में वही आग्रह था जो ऐसे स्थानों पर अक्सर सुनाई देता है—कुछ दे दीजिए।

वह एक यात्री के पास गई।

फिर दूसरे के।

फिर तीसरे के।

लोगों ने उसकी ओर देखा।

कुछ ने अनदेखा कर दिया।

कुछ ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी।

लेकिन किसी ने कुछ नहीं दिया।

वह कुछ देर तक घूमती रही और फिर चली गई।

मैंने उसे जाते हुए देखा।

उसके जाने के बाद प्रतीक्षालय फिर वैसा ही हो गया।

कुछ देर बाद एक दूसरी भिखारिन आई।

उसकी गोद में एक बच्चा था।

वह बच्चे को अपने शरीर से लगाए हुए यात्रियों के पास जा रही थी।

बच्चा शायद इस पूरे संसार से अनजान था।

उसे न पता था कि वह रेलवे स्टेशन पर है, न यह कि उसकी माँ लोगों से पैसे क्यों माँग रही है।

वह बस अपनी माँ की गोद में था।

माँ लोगों की आँखों में कुछ खोज रही थी—शायद दया, शायद सहायता, शायद कुछ सिक्के।

वह एक व्यक्ति के पास गई।

फिर दूसरे के पास।

लेकिन यहाँ भी किसी ने कुछ नहीं दिया।

वह भी अंततः आगे बढ़ गई।

उस क्षण मुझे लगा कि रेलवे स्टेशन पर केवल ट्रेनें नहीं चलतीं।

यहाँ उम्मीदें भी चलती हैं।

कोई उम्मीद लेकर आता है कि उसकी ट्रेन समय पर आएगी।

कोई उम्मीद लेकर आता है कि उसे सीट मिल जाएगी।

कोई उम्मीद लेकर आता है कि घर पहुँचते ही कोई उसका इंतज़ार कर रहा होगा।

और कोई उम्मीद लेकर आता है कि शायद आज किसी के हाथ से कुछ मिल जाएगा।

लेकिन हर उम्मीद पूरी नहीं होती।

फिर एक दिव्यांग व्यक्ति आया।

वह भी लोगों से पैसे माँगने लगा।

कुछ लोगों ने उसे समझाया कि यहाँ न माँगे, बाहर जाकर माँगे।

शायद लोगों की अपनी सुविधा का तर्क था।

प्रतीक्षालय यात्रियों के बैठने की जगह है, भीख माँगने की जगह नहीं।

लेकिन उस व्यक्ति ने बात मानने से इनकार कर दिया।

उसने बहस शुरू कर दी।

उसके भीतर शायद लंबे समय से जमा कोई असंतोष था, जो उस क्षण शब्दों में बाहर आ गया।

वह कहने लगा कि वह यहीं माँगेगा।

लोग उसे समझाते रहे।

वह अपनी बात पर अड़ा रहा।

फिर उसने कहा—

"सब जगह बराबर है।"

वाक्य छोटा था।

लेकिन मेरे भीतर वह कुछ देर तक गूँजता रहा।

सब जगह बराबर है।

कितना अजीब वाक्य था!

जिसे लोग केवल जिद समझ रहे थे, उसमें शायद उसके जीवन का अनुभव बोल रहा था।

उसके लिए सड़क और प्रतीक्षालय के बीच शायद बहुत बड़ा अंतर नहीं था।

वह जहाँ भी जाता, उसे अपनी आवश्यकता लेकर ही जाना पड़ता था।

वह जहाँ भी खड़ा होता, उसे किसी और की दया पर निर्भर रहना पड़ता था।

लेकिन वहाँ बैठे यात्रियों के लिए उसकी उपस्थिति असुविधाजनक थी।

किसी ने उसे बाहर जाने को कहा।

किसी ने उसकी बात पर हँसी उड़ाई।

कुछ लोग हँसने लगे।

किसी ने टिप्पणी की—

"भीख माँग रहा है या गुंडागर्दी कर रहा है?"

लोग हँसे।

वह आदमी बहस करता रहा।

लेकिन विडंबना यह थी कि उसकी बहस ने उसे कुछ नहीं दिया।

न पैसे।

न सहानुभूति।

न समाधान।

अंततः वह वहाँ से चला गया।

मैं उसे जाते हुए देखता रहा।

कुछ देर पहले तक वह भीख माँग रहा था।

फिर वह बहस करने लगा।

और फिर वह खाली हाथ चला गया।

मनुष्य की गरिमा और उसकी आवश्यकता के बीच का अंतर शायद कभी-कभी इतना ही होता है—कुछ शब्दों का।

फिर प्रतीक्षालय में एक सफाईकर्मी आया।

उसके हाथ में पोछा था।

वह चुपचाप अपना काम करने लगा।

वह किसी से बहस नहीं कर रहा था।

किसी से कुछ माँग नहीं रहा था।

किसी को कुछ समझा नहीं रहा था।

बस फर्श साफ कर रहा था।

उसके आने पर हम सबने अपने पैर उठा लिए।

वह पोछा हमारे पैरों के नीचे से निकालता गया।

हम कुछ क्षण पैर ऊपर रखते।

वह उस जगह को साफ करता।

फिर हम पैर नीचे कर देते।

वह आगे बढ़ता।

फिर हम पैर उठा लेते।

एक अजीब-सी सामूहिक लय बन गई थी।

वह साफ कर रहा था।

हम रास्ता दे रहे थे।

कुछ क्षणों के लिए हमारे बीच कोई संवाद नहीं था, लेकिन एक मौन समझ थी।

वह अपना काम कर रहा था।

हम उसकी मदद कर रहे थे—शायद केवल इसलिए कि उसका पोछा हमारे पैरों से टकराए नहीं।

मैं उसे देखता रहा।

वह उस फर्श को साफ कर रहा था जिस पर थोड़ी देर पहले बारिश का पानी था, लोगों के जूते थे, यात्रियों की आवाजाही थी और हमारी सारी छोटी-बड़ी परेशानियाँ थीं।

उसके हाथ में पोछा था।

हमारे हाथों में मोबाइल फोन।

लेकिन उस समय फर्श पर व्यवस्था उसी के हाथों में थी।

वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता गया।

अंततः उसका काम लगभग समाप्त हो गया।

वह जाने लगा।

तभी एक यात्री अचानक उठकर बाहर की ओर जाने लगा।

शायद उसने कोई घोषणा सुनी थी।

उसे लगा कि उसकी ट्रेन आ गई है।

वह जल्दी में था।

ट्रेन किसी का इंतज़ार नहीं करती—यह विचार शायद उसके भीतर दौड़ रहा था।

लेकिन तभी सफाईकर्मी ने उसे रोक दिया।

उसकी आवाज़ में नाराज़गी थी।

"दिख नहीं रहा है कि सफाई कर रहा हूँ?"

यात्री शायद समझाने की कोशिश कर रहा था कि उसे बाहर जाना है।

लेकिन सफाईकर्मी भी अपनी जगह सही था।

वह अभी-अभी उस हिस्से को साफ कर रहा था।

उसका तर्क सरल था—

जब कोई सफाई कर रहा हो तो कम-से-कम कुछ क्षण रुक जाना चाहिए।

यात्री का तर्क भी सरल था—

अगर ट्रेन आ गई है तो उसे जाना ही होगा।

दोनों अपने-अपने छोटे-से सत्य के साथ खड़े थे।

और कुछ क्षणों में प्रतीक्षालय फिर एक बहस का मंच बन गया।

हम सब देखने लगे।

फिर किसी ने मुस्कुराया।

किसी और को हँसी आई।

और देखते-देखते हम सब हँसने लगे।

स्थिति वास्तव में हास्यास्पद थी।

एक तरफ सफाईकर्मी था जो फर्श को साफ रखना चाहता था।

दूसरी तरफ यात्री था जो अपनी ट्रेन पकड़ना चाहता था।

दोनों अपने-अपने काम में सही थे।

बस उनकी दिशाएँ एक-दूसरे से टकरा गई थीं।

मुझे लगा, जीवन में शायद बहुत-सी लड़ाइयाँ ऐसी ही होती हैं।

दोनों पक्ष अपनी जगह सही होते हैं।

समस्या यह नहीं होती कि कोई गलत है।

समस्या यह होती है कि दो सही रास्ते एक ही क्षण में एक-दूसरे से टकरा जाते हैं।

तभी फिर कोई घोषणा हुई।

इस बार मुझे लगा कि अब मेरी ट्रेन का समय हो गया है।

मैंने अपना सामान उठाया।

प्रतीक्षालय से बाहर निकला।

प्लेटफ़ॉर्म की ओर बढ़ा।

कुछ ही देर बाद मेरी ट्रेन सामने थी।

मैं ट्रेन में चढ़ गया।

अपनी जगह पर बैठ गया।

ट्रेन चलने लगी।

प्लेटफ़ॉर्म धीरे-धीरे पीछे छूटने लगा।

लेकिन मेरी आँखों के सामने अभी भी वही प्रतीक्षालय था।

वही टपकती हुई छत।

वही बाल्टी।

वही डिब्बा।

वही गीला फर्श।

वही लोग।

वही भिखारिनें।

वही बच्चा।

वही दिव्यांग व्यक्ति।

वही सफाईकर्मी।

वही बहस।

वही हँसी।

और वही प्रतीक्षा।

ट्रेन आगे बढ़ती रही।

मैंने खिड़की से बाहर देखा।

लोग अभी भी आ रहे थे।

लोग अभी भी जा रहे थे।

स्टेशन का जीवन मेरी ट्रेन के जाने से समाप्त नहीं हुआ था।

मेरे लिए यात्रा शुरू हो गई थी।

लेकिन स्टेशन पर किसी दूसरे यात्री की प्रतीक्षा शुरू हो गई होगी।

यही तो स्टेशन की नियति है।

कोई आता है।

कोई जाता है।

कोई रुकता है।

कोई दौड़ता है।

कोई प्रतीक्षा करता है।

और कोई किसी के चले जाने के बाद उसी जगह बैठ जाता है।

उस दिन मुझे लगा कि वह प्रतीक्षालय केवल रेलवे का एक कमरा नहीं था।

वह समाज का एक छोटा-सा प्रतिरूप था।

वहाँ हमारी पूरी सामाजिक दुनिया सिकुड़कर बैठी थी।

गरीबी थी।

श्रम था।

असमानता थी।

असुविधा थी।

अधिकार की भावना थी।

असहायता थी।

हँसी थी।

क्रोध था।

उपेक्षा थी।

और इन सबके बीच मनुष्य था।

एक ऐसा मनुष्य जो हर परिस्थिति में किसी तरह जीने का रास्ता निकाल लेता है।

छत टपकती है तो बाल्टी रख देता है।

फर्श गीला है तो सूखी जगह तलाश लेता है।

बैठने की जगह नहीं है तो खड़ा हो जाता है।

पैसे नहीं हैं तो माँगता है।

कोई नहीं देता तो अगले व्यक्ति के पास चला जाता है।

सफाई करनी है तो पानी के बीच भी पोछा लगाता है।

ट्रेन पकड़नी है तो भीड़ के बीच रास्ता बनाता है।

और जब सब कुछ समाप्त हो जाता है, तब भी अगली ट्रेन की प्रतीक्षा करता है।

शायद यही मनुष्य की सबसे बड़ी क्षमता है—

वह अपूर्ण परिस्थितियों में भी जीवन को पूरा जीने की कोशिश करता रहता है।

लेकिन उस दिन उस प्रतीक्षालय ने मुझे एक और बात सिखाई।

हम सभी किसी न किसी अर्थ में भिखारी हैं।

यह बात सुनने में कठोर लग सकती है।

लेकिन सोचिए।

कोई प्रेम माँगता है।

कोई सम्मान।

कोई अवसर।

कोई पैसा।

कोई नौकरी।

कोई समय।

कोई क्षमा।

कोई साथ।

कोई न्याय।

कोई सिर्फ यह चाहता है कि कोई उसकी बात सुन ले।

अंतर केवल इतना है कि हम अपनी आवश्यकताओं को अलग-अलग नाम देते हैं।

वह व्यक्ति पैसे माँग रहा था।

हममें से कोई प्रेम माँग रहा होता है।

कोई स्वीकृति।

कोई सफलता।

कोई पहचान।

कोई अपने अस्तित्व का प्रमाण।

हर मनुष्य किसी न किसी प्रतीक्षालय में बैठा है।

हर कोई किसी न किसी ट्रेन का इंतज़ार कर रहा है।

और हर किसी के पास अपनी-अपनी चिंता है कि कहीं उसकी ट्रेन छूट न जाए।

वह दिव्यांग व्यक्ति जब कह रहा था—

"सब जगह बराबर है"

तो शायद वह केवल जगह की बात नहीं कर रहा था।

शायद जीवन की दृष्टि से भी यह वाक्य बहुत गहरा था।

सड़क हो या प्रतीक्षालय।

शहर हो या गाँव।

अमीर हो या गरीब।

हर मनुष्य को अंततः एक ही धरती पर खड़ा होना है।

हाँ, सुविधाएँ अलग हैं।

अवसर अलग हैं।

परिस्थितियाँ अलग हैं।

लेकिन भूख की पीड़ा, अकेलेपन की पीड़ा, अपमान की पीड़ा और प्रतीक्षा की पीड़ा—इनकी कोई निश्चित सामाजिक श्रेणी नहीं होती।

फिर भी हम बराबरी को अक्सर केवल स्थान और अधिकार की भाषा में देखते हैं।

और शायद यही कारण है कि एक भिखारी की आवाज़ हमें असुविधाजनक लगती है, जबकि उसी आवाज़ में किसी मनुष्य की पूरी कहानी छिपी हो सकती है।

मैंने ट्रेन की खिड़की से बाहर देखते हुए सोचा—

कितनी विचित्र बात है कि हम स्टेशन पर कुछ घंटों की प्रतीक्षा को भी कठिन मानते हैं, जबकि कुछ लोग पूरी जिंदगी प्रतीक्षा में गुज़ार देते हैं।

किसी को नौकरी की प्रतीक्षा है।

किसी को इलाज की।

किसी को न्याय की।

किसी को प्रेम की।

किसी को सम्मान की।

किसी को एक बेहतर जीवन की।

और किसी को केवल अगले भोजन की।

हम सब यात्री हैं।

बस हमारी मंज़िलें अलग हैं।

ट्रेनें अलग हैं।

टिकट अलग हैं।

प्रतीक्षालय अलग हैं।

लेकिन प्रतीक्षा सबके जीवन में है।

मेरी ट्रेन अब काफी आगे निकल चुकी थी।

मुज़फ़्फ़रपुर जंक्शन पीछे छूट चुका था।

लेकिन मुझे लग रहा था कि मैं उस स्टेशन से कुछ लेकर आया हूँ।

कोई वस्तु नहीं।

कोई तस्वीर नहीं।

बस कुछ दृश्य।

कुछ आवाज़ें।

कुछ वाक्य।

और कुछ प्रश्न।

एक टपकती हुई छत ने मुझे व्यवस्था की याद दिलाई।

एक भिखारिन ने मुझे आवश्यकता की।

गोद में बच्चा लिए महिला ने मुझे असहायता की।

दिव्यांग व्यक्ति ने मुझे अधिकार और गरिमा की।

सफाईकर्मी ने मुझे श्रम की।

उस यात्री और सफाईकर्मी की बहस ने मुझे मनुष्य की छोटी-छोटी टकराहटों की।

और मेरी ट्रेन ने मुझे गति की।

शायद जीवन भी ऐसा ही है।

हम कुछ समय के लिए किसी प्रतीक्षालय में बैठते हैं।

अपने आसपास की दुनिया देखते हैं।

कुछ लोगों से मिलते हैं।

कुछ घटनाओं पर हँसते हैं।

कुछ घटनाओं से असहज होते हैं।

कुछ को समझते हैं।

कुछ को नहीं समझ पाते।

फिर अचानक हमारी ट्रेन की घोषणा हो जाती है।

हम अपना सामान उठाते हैं।

चल पड़ते हैं।

और पीछे छूट जाता है वह संसार, जिसमें कुछ देर पहले हम भी उसका एक हिस्सा थे।

लेकिन क्या वह संसार सचमुच पीछे छूट जाता है?

शायद नहीं।

कुछ दृश्य मनुष्य के भीतर रह जाते हैं।

मुज़फ़्फ़रपुर जंक्शन का वह प्रतीक्षालय भी मेरे भीतर रह गया।

आज भी अगर उस दृश्य को याद करता हूँ तो सबसे पहले मुझे कोई ट्रेन दिखाई नहीं देती।

मुझे एक छत दिखाई देती है—

जिससे पानी टपक रहा है।

एक बाल्टी दिखाई देती है—

जो लगातार गिरते पानी को अपने भीतर समेट रही है।

कुछ लोग दिखाई देते हैं—

जो उस असुविधा को स्वीकार करके बैठे हैं।

एक स्त्री दिखाई देती है—

जो गोद में बच्चा लिए किसी की करुणा तलाश रही है।

एक व्यक्ति दिखाई देता है—

जो कह रहा है—

"सब जगह बराबर है।"

एक सफाईकर्मी दिखाई देता है—

जो उस फर्श को साफ कर रहा है जिसे ऊपर से आती हुई छत फिर गीला कर रही है।

और अंत में एक ट्रेन दिखाई देती है—

जो आती है और चली जाती है।

शायद यही हमारी दुनिया है।

ऊपर से समस्याएँ गिरती रहती हैं।

नीचे हम बाल्टियाँ रखते रहते हैं।

कुछ लोग शिकायत करते हैं।

कुछ लोग बहस करते हैं।

कुछ लोग हँसते हैं।

कुछ लोग सफाई करते हैं।

कुछ लोग मदद माँगते हैं।

कुछ लोग मदद करते हैं।

और कुछ लोग बिना कुछ कहे अपनी ट्रेन पकड़ लेते हैं।

व्यवस्था शायद तुरंत नहीं बदलती।

लेकिन मनुष्य चलता रहता है।

यात्राएँ चलती रहती हैं।

ट्रेनें चलती रहती हैं।

प्रतीक्षाएँ चलती रहती हैं।

और जीवन—

वह भी अपनी पटरी पर आगे बढ़ता रहता है।

मुज़फ़्फ़रपुर जंक्शन पीछे छूट गया था।

लेकिन उस दिन मुझे लगा कि शायद मैं वहाँ से केवल एक ट्रेन पर सवार होकर नहीं निकला।

मैं अपने साथ एक पूरा छोटा-सा संसार लेकर चला आया था।

एक प्रतीक्षालय का संसार।

जहाँ छत टपक रही थी,

लोग प्रतीक्षा कर रहे थे,

कुछ माँग रहे थे,

कुछ दे नहीं रहे थे,

कोई सफाई कर रहा था,

कोई बहस कर रहा था,

कोई हँस रहा था,

और कोई अपनी ट्रेन के आने की प्रतीक्षा में चुपचाप बैठा था।

और शायद हम सब—

अपने-अपने जीवन के प्रतीक्षालय में—

आज भी किसी न किसी घोषणा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

किसी दिन हमारी ट्रेन भी आएगी।

तब हम उठेंगे।

अपना सामान उठाएँगे।

पीछे मुड़कर शायद एक बार देखेंगे।

और फिर चल पड़ेंगे।

लेकिन तब तक—

प्रतीक्षा जारी है।

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