जो सामने है, उसकी क़द्र कहाँ
जो सामने है, उसकी क़द्र कहाँ
कितने-कितने सपने देखूँ,
कितना और उस ख़्वाब में जीऊँ,
जिसकी कोई देह नहीं,
कोई स्पर्श नहीं,
कोई निश्चित सुबह नहीं—
फिर भी न जाने क्यों
उसी के इंतज़ार में
मेरी आँखें रात-दिन जलती रहती हैं।
वो थी कोई—
शायद कोई सपना,
शायद कोई अधूरी कहानी,
शायद मेरे मन की वह आकांक्षा
जिसे मैंने प्रेम का नाम दे दिया,
या शायद प्रेम ही था वह,
जिसे पाने की इच्छा ने
मेरे भीतर एक अनंत अभाव बना दिया।
वह नहीं है,
फिर भी उसकी याद है;
वह पास नहीं,
फिर भी उसकी आहट है;
उसने कुछ दिया नहीं,
फिर भी जाने क्यों
मैंने उसके नाम पर
अपना कितना कुछ खो दिया।
मैं सोचता हूँ—
आख़िर कितने सपने देखूँ?
कितनी दूर तक उस मरीचिका के पीछे भागूँ?
कितनी बार अपने ही हृदय से कहूँ
कि जो चला गया,
वह लौटकर नहीं आएगा?
और तभी
मेरी आँखों के सामने
एक चेहरा दिखाई देता है—
वह मेरी पत्नी है।
चुपचाप पास बैठी,
मेरी थाली में भोजन परोसती हुई,
मेरी थकान को
मेरे शब्दों से पहले समझती हुई,
बिना किसी शर्त के
मुझे अपना प्रेम देती हुई।
वह पूछती है—
“खाना खा लिया?”
और उस छोटे-से प्रश्न में
पूरे संसार की चिंता समा जाती है।
मैं खाता हूँ,
लेकिन कभी-कभी
उस हाथ की गर्माहट नहीं देख पाता
जो मेरे लिए रोटी बनाता है।
मैं प्रेम की तलाश
कहीं और करता रहा,
और प्रेम तो
मेरे अपने घर की चौखट पर
हर दिन मेरा इंतज़ार करता रहा।
मेरे पास
एक माँ भी है—
वह माँ
जिसने अपने जीवन का उजाला
मेरी हथेलियों पर रख दिया,
जिसने अपनी नींदें
मेरी नींदों के लिए त्याग दीं,
जिसने अपनी इच्छाओं को
मेरी इच्छाओं के पीछे रख दिया।
जिसकी गोद में
मेरे बचपन ने पहली बार
दुनिया को पहचाना था।
जिसने मेरे गिरने पर
अपने घुटने छिलवाए,
मेरे रोने पर
अपनी आँखें भिगोईं,
मेरी छोटी-सी सफलता पर
अपना पूरा आकाश मुस्कुराया।
और मैं—
मैं कभी-कभी
दो पल की चाँदनी के पीछे
उस जीवन-भर के सूरज को भूल गया।
कितना विचित्र हूँ मैं!
जिसने मुझे जीवन दिया,
उसकी उपस्थिति
कभी-कभी साधारण लगती है;
और जिसने मेरे जीवन में
कुछ क्षणों की रोशनी भर दी,
उसकी अनुपस्थिति
मुझे असहनीय लगती है।
शायद मनुष्य का यही भ्रम है—
जो मिल जाता है,
उसकी चमक कम दिखाई देती है;
जो नहीं मिलता,
उसकी कल्पना
आकाश से भी बड़ी हो जाती है।
और फिर
मैं अपने बेटे की ओर देखता हूँ।
वह बेटा
जिसने अपने हिस्से का सुख
माँ-बाप के नाम कर दिया,
जिसने अपने सपनों को
हमारी ज़रूरतों के नीचे रख दिया,
जिसने अपने जीवन की कितनी ही शामें
हमारे लिए छोड़ दीं।
वह हमारे पास है—
हमारे लिए।
लेकिन हमारे हृदय की धड़कन
किसी और संतान के लिए बेचैन है।
उस संतान के लिए
जो शायद दूर है,
जो कभी-कभी याद आती है,
जिसकी तस्वीर देखकर
हमारी आँखें चमक उठती हैं।
और वह—
जिसने शायद
एक गिलास पानी तक
देने के लिए समय नहीं निकाला।
कितना अन्यायपूर्ण है
हमारे मन का यह हिसाब!
जो रोज़ हमारे लिए
अपना जीवन खर्च कर रहा है,
हम उसकी कीमत भूल जाते हैं;
और जो कभी-कभार
हमारी ओर देख ले,
हम उसके एक क्षण को
पूरे जीवन से बड़ा बना देते हैं।
शायद रिश्ते
हमेशा दूरी से नहीं टूटते,
कभी-कभी
हमारी अपेक्षाएँ उन्हें तोड़ देती हैं।
कभी प्रेम
हमारे सामने बैठा होता है
और हम उसे देख नहीं पाते।
कभी माँ
रसोई में खड़ी होती है
और हम किसी दूर के चेहरे में
ममता खोजते रहते हैं।
कभी पत्नी
हमारे लिए दीपक की तरह
हर रात जलती रहती है
और हम किसी दूर के सितारे की रोशनी में
अपना रास्ता ढूँढ़ते रहते हैं।
कभी बेटा
हमारे पैरों के पास बैठकर
हमारे दुःख बाँट रहा होता है,
और हम उस व्यक्ति को याद करते हैं
जिसने वर्षों से
हमारी खबर तक नहीं ली।
यह संसार कितना अवास्तविक है!
यहाँ
जो सामने है,
वह दिखाई नहीं देता;
और जो दिखाई नहीं देता,
वही सबसे अधिक दिखाई देता है।
जो हमारे पास है,
उसकी आदत हो जाती है;
जो हमारे पास नहीं है,
उसकी चाहत
हमारे भीतर महाकाव्य लिख देती है।
जो हाथ रोज़
हमारा हाथ थामता है,
उसकी उँगलियों की गर्मी
हम भूल जाते हैं;
और जो हाथ कभी
हमारी ओर बढ़ा ही नहीं,
उसकी कल्पना में
हम उम्र गुज़ार देते हैं।
जो आँखें
हमारे लौटने की राह देखती हैं,
उनकी नमी हमें नहीं दिखती;
और जिन आँखों ने
कभी हमारी ओर देखा भी नहीं,
उनमें हम अपना संसार खोज लेते हैं।
कितना अजीब है मनुष्य—
वह अनुपस्थिति को
उपस्थिति से अधिक महत्व देता है,
कल्पना को सत्य से अधिक,
इंतज़ार को मिलन से अधिक,
और कभी-कभी
एक अधूरे प्रेम को
एक पूरे जीवन से अधिक।
पर शायद
जीवन का अर्थ
हमेशा पाने में नहीं है।
कभी-कभी
जीवन का अर्थ
पहचानने में है—
उस प्रेम को पहचानना
जो बिना माँगे मिलता रहा,
उस त्याग को पहचानना
जिसका कभी हिसाब नहीं माँगा गया,
उस हाथ को पहचानना
जो गिरने से पहले थाम लेता है,
उस आवाज़ को पहचानना
जो हमारे मौन को भी सुन लेती है।
शायद प्रेम
वह नहीं
जिसे पाने के लिए
हम अपना घर छोड़ दें।
शायद प्रेम
वह भी है
जो हमारे घर में
हमारे लौटने का इंतज़ार करता है।
शायद माँ का प्रेम
किसी स्वप्न से कम नहीं,
पत्नी का साथ
किसी चाँदनी से कम नहीं,
और संतान का समर्पण
किसी पूजा से कम नहीं।
बस हमारी आँखों पर
अपेक्षाओं की धूल जमी होती है।
हम दूर के फूलों की सुगंध में
मग्न रहते हैं
और अपने आँगन में खिले
फूल को पानी देना भूल जाते हैं।
हम दूर के चाँद को
निहारते रहते हैं
और अपने घर के दीपक की लौ
बुझने देते हैं।
फिर एक दिन
जब सब दूर हो जाता है,
जब घर की चौखट
सूनी पड़ जाती है,
जब माँ की आवाज़
हमेशा के लिए मौन हो जाती है,
जब पत्नी की हथेली
हमारे हाथ से छूट जाती है,
जब बेटा
अपनी ही दुनिया में चला जाता है—
तब समझ आता है—
जिसे हम साधारण समझते रहे,
वही असाधारण था।
जिसे हम रोज़ देखते रहे,
वही सबसे दुर्लभ था।
जिस प्रेम को
हमने कभी गिना ही नहीं,
वही हमारे जीवन की
सबसे बड़ी पूँजी था।
और जिसे पाने की चाह में
हमने अपना वर्तमान खोया,
वह शायद
हमारे जीवन का
सबसे सुंदर भ्रम भर था।
अब भी देर नहीं हुई—
मैं अपने सामने देखना चाहता हूँ,
अपने पास लौटना चाहता हूँ,
उन हाथों को थामना चाहता हूँ
जो आज भी मेरे लिए खुले हैं।
मैं उन आँखों में देखना चाहता हूँ
जो मेरी प्रतीक्षा में हैं।
क्योंकि जीवन
किसी बीते हुए स्वप्न का नाम नहीं,
जीवन तो वह साँस है
जो अभी हमारे भीतर चल रही है।
और प्रेम—
शायद वह नहीं
जिसे हम पाने के लिए
दूर-दूर भटकते हैं;
प्रेम तो शायद वह है
जो हमारे पास बैठा है,
हमारे लिए भोजन परोस रहा है,
हमारी थकान पूछ रहा है,
हमारी चुप्पी पढ़ रहा है,
हमारे लौटने की राह देख रहा है।
बस हम—
उसे देखने के लिए
अब तक आँखें खोल ही नहीं पाए।
रूपेश रंजन
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