बादल रोए....
बादल रोए,
धरती मुस्कुराए,बूँद-बूँद जब आँचल में आए,
सूखी मिट्टी फिर महक उठे,
जैसे कोई भूली हुई याद
अचानक लौट आए।
फिर क्यों न बादल
बार-बार रोए,
अगर उसकी हर एक बूँद से
धरती के होंठों पर
मुस्कान आती है।
वह खुद को खोता है
धरती को पाने के लिए,
आसमान से उतरता है
उसकी प्यास बुझाने के लिए।
बादल का रोना भी
कितना अजीब है—
उसकी आँखों से आँसू गिरते हैं
और किसी की दुनिया
हरी हो जाती है।
शायद प्रेम भी ऐसा ही होता है,
जहाँ एक का दर्द
दूसरे की ख़ुशी बन जाए,
जहाँ बिछड़ने वाला रोए
और मिलने वाला
मुस्कुराए।
तो बादल रोए,
बार-बार रोए—
धरती की प्यास के लिए,
फूलों की हँसी के लिए,
नदियों की रवानी के लिए,
और उस प्रेम के लिए
जो ख़ुद भीगकर
किसी और को
जीना सिखाता है।
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