मेरे सामने वो बैठी है...
मेरे सामने वो बैठी है,
और मैं उसे देख रहा हूँ,न जाने कितनी बातें हैं दिल में,
फिर भी कुछ कह नहीं पा रहा हूँ।
उसकी आँखों में जैसे
कोई पूरा मौसम ठहरा है,
और मेरी आँखों में
उसका ही चेहरा गहरा है।
कहना तो बहुत कुछ है उससे,
मगर शब्द साथ नहीं देते,
दिल की बातें होंठों तक आकर
जाने क्यों लौट जाती हैं।
वो शायद मेरी खामोशी पढ़ रही है,
या शायद कुछ समझ नहीं रही,
मैं उसकी आँखों में
अपना सवाल खोज रहा हूँ,
और वो मेरी आँखों में
शायद अपना जवाब।
कितना अजीब है प्रेम भी—
जिससे सबसे ज्यादा कहना हो,
उसी के सामने
इंसान सबसे ज्यादा चुप हो जाता है।
मैं चाहता हूँ
बस उसका हाथ थामकर कह दूँ—
“तुम्हें देखकर
आज फिर यकीन हुआ है
कि कुछ पल
पूरी जिंदगी से ज्यादा खूबसूरत होते हैं।”
मगर मैं चुप हूँ...
वो मेरे सामने बैठी है,
और मैं उसे देख रहा हूँ।
शायद उसे पता नहीं,
कि इस वक्त
मेरे भीतर कितनी कविताएँ
उसके नाम से जन्म ले रही हैं।
वो सामने है,
फिर भी एक दूरी है—
शायद यही प्रेम है,
कि पास बैठा इंसान भी
दिल को छूकर
शब्दों से दूर कर दे।
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