कुछ पता नहीं चलता...
कुछ पता नहीं चलता,
क्या वो भी मुझसे प्रेम करती है,
या बस यूँ ही
मेरी धड़कनों से खेलती है।
कभी सामने आकर
इतना करीब हो जाती है
कि लगता है—
हाँ, उसके दिल में भी
कुछ तो है मेरे लिए।
फिर अचानक
नज़रों से ओझल हो जाती है,
ऐसी खामोशी छोड़ जाती है
कि मैं सारी रात
उसके अर्थ खोजता रहता हूँ।
कभी उसकी आँखें
बहुत कुछ कहती हैं,
कभी वही आँखें
मुझसे अनजान हो जाती हैं।
मैं समझ नहीं पाता—
यह प्रेम है,
संकोच है,
या बस उसकी आदत
मुझे उलझाए रखने की।
शायद यही उसका तरीका है,
पास आना,
फिर दूर हो जाना,
एक उम्मीद जगाना,
फिर उसे अधूरा छोड़ जाना।
और मैं भी अजीब हूँ—
हर बार उसके लौटने पर
अपनी सारी शिकायतें भूल जाता हूँ,
हर बार उसके जाने पर
खुद से पूछता हूँ—
आखिर मैं उसके लिए
क्या हूँ?
कभी लगता है
वो भी मेरी तरह बेचैन है,
कभी लगता है
मैं ही अकेला
इस कहानी को प्रेम समझ बैठा हूँ।
काश, वो एक दिन
बस इतना कह दे—
“हाँ, मैं भी तुम्हें चाहती हूँ।”
या फिर साफ कह दे—
“नहीं।”
क्योंकि यह जो बीच में
लटका हुआ रिश्ता है,
यह प्रेम से भी ज्यादा
थका देता है।
फिर भी…
वो सामने आती है
तो दिल फिर उम्मीद कर बैठता है,
और जब छुप जाती है,
तो वही दिल
उसका इंतज़ार करता रहता है।
शायद प्रेम यही है—
किसी के उत्तर से ज्यादा
उसकी खामोशी में
अपने लिए एक अर्थ खोजते रहना।
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