धोखे से मिल जाए अगर कुछ...

धोखे से मिल जाए अगर कुछ,

तो उसे पाना भी क्या पाना,

किसी की आँखों में धूल झोंककर

किसी ख़्वाब को अपना बनाना।


इधर-उधर की राहों से होकर

मंज़िल तक पहुँच भी जाएँ,

पर मन के भीतर जो सच बैठा है,

उससे कैसे नज़र मिलाएँ?


बेहतर है थोड़ा इंतज़ार करें,

राह में कुछ शामें गुज़ारें,

जो हमारा है, वह लौट आएगा—

हम क्यों किसी का हक़ मारें?


मिल जाए तो प्रेम से मिले,

न मिले तो इंतज़ार रहे,

दिल में किसी के लिए जगह हो,

पर दिल पर कोई भार न रहे।


क्या ही मज़ा उस जीत में,

जिसमें किसी की हार छिपी हो,

क्या ही ख़ुशी उस मिलन में,

जिसमें किसी की आँख नम हुई हो।


हमें तो वह मिलना चाहिए

जिसमें कोई छल न हो,

जिसमें दो दिल स्वयं चलकर आएँ,

किसी रास्ते में कोई बल न हो।


देर लगे तो देर सही,

मंज़िल थोड़ी दूर सही,

झूठी जीत से बेहतर है

सच्चे प्रेम का इंतज़ार सही।


नहीं मिला तो नहीं मिला,

पर मन तो साफ़ रहा,

जिसे पाना था प्रेम से—

उसके लिए इंतज़ार रहा।

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