यदि नाथूराम गोडसे गांधीजी के सामने मृत्यु के बाद आते: क्या गांधी उन्हें क्षमा कर देते?

यदि नाथूराम गोडसे गांधीजी के सामने मृत्यु के बाद आते: क्या गांधी उन्हें क्षमा कर देते?


इतिहास में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका उत्तर किसी दस्तावेज़ में सीधे नहीं मिलता। फिर भी वे प्रश्न महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि उनका उत्तर उस व्यक्ति के विचारों, जीवन-दर्शन, आचरण और उसके द्वारा जीवनभर कही गई बातों में खोजा जा सकता है।


ऐसा ही एक प्रश्न है—


यदि नाथूराम गोडसे गांधीजी की हत्या के बाद किसी तरह गांधीजी के सामने आते, तो क्या गांधीजी उन्हें क्षमा कर देते?


इस प्रश्न का शाब्दिक और निश्चित उत्तर हमारे पास नहीं है। गांधीजी की मृत्यु के बाद गोडसे और गांधीजी के बीच ऐसी कोई मुलाकात इतिहास में हुई ही नहीं। इसलिए यह कहना कि "गांधीजी निश्चित रूप से ऐसा ही करते" ऐतिहासिक तथ्य नहीं होगा।


लेकिन गांधीजी ने क्षमा, अहिंसा, प्रतिशोध, घृणा, अपराध, पश्चाताप और मनुष्य के परिवर्तन के बारे में इतना कुछ लिखा और कहा है कि उनके विचारों के आधार पर एक मजबूत अनुमान अवश्य लगाया जा सकता है।


और वह अनुमान यह हो सकता है कि—


गांधीजी संभवतः गोडसे को एक मनुष्य के रूप में क्षमा कर देते, लेकिन उसके द्वारा किए गए कृत्य को सही नहीं मानते।


यही अंतर सबसे महत्वपूर्ण है।


किसी व्यक्ति को क्षमा करना उसके अपराध को उचित ठहराना नहीं है।


किसी व्यक्ति की मानवता को स्वीकार करना उसके विचारों का समर्थन करना नहीं है।


और प्रतिशोध से इनकार करना न्याय से इनकार करना नहीं है।


गांधीजी के दर्शन को समझने के लिए इन तीनों बातों को अलग-अलग रखना आवश्यक है।



गांधीजी की हत्या और उसके पीछे का इतिहास


30 जनवरी 1948 को नई दिल्ली स्थित बिरला भवन में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय गांधीजी की गोली मारकर हत्या कर दी गई। नाथूराम विनायक गोडसे ने उन पर गोली चलाई।


यह घटना भारत के इतिहास के अत्यंत संवेदनशील दौर में हुई थी।


देश अभी-अभी स्वतंत्र हुआ था।


विभाजन की त्रासदी से लाखों लोग विस्थापित हो चुके थे।


हिंदू, मुस्लिम और सिख समुदायों के बीच भयंकर हिंसा हो चुकी थी।


दिल्ली, पंजाब, बंगाल और उपमहाद्वीप के अन्य हिस्से साम्प्रदायिक तनाव से गुजर रहे थे।


ऐसे समय में गांधीजी लगातार लोगों से हिंसा रोकने, बदला छोड़ने और एक-दूसरे के प्रति मनुष्य की तरह व्यवहार करने की अपील कर रहे थे।


वे केवल भाषण नहीं दे रहे थे।


वे हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में जा रहे थे।


उन्होंने उपवास किए।


उन्होंने लोगों से अपने भीतर की घृणा को समाप्त करने की अपील की।


और जब उनकी अपनी जान को खतरा था, तब भी वे प्रतिशोध की भाषा नहीं बोल रहे थे।


गांधीजी की हत्या से केवल दस दिन पहले, 20 जनवरी 1948 को उनकी प्रार्थना सभा में बम विस्फोट का प्रयास भी हुआ था।


इस पृष्ठभूमि को समझे बिना गांधीजी और गोडसे के बीच संभावित क्षमा की चर्चा अधूरी रह जाती है।



गांधीजी ने अपने संभावित हत्यारे के बारे में पहले ही क्या कहा था?


इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण आधार गांधीजी के अपने अंतिम दिनों के कथनों में मिलता है।


गांधीजी ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में यह विचार व्यक्त किया था कि यदि कोई व्यक्ति उन्हें मारने का प्रयास करे, तो वे उसके प्रति घृणा लेकर मृत्यु को प्राप्त नहीं होना चाहते।


उनकी इच्छा थी कि मृत्यु के क्षण भी उनके मन में ईश्वर का स्मरण हो, न कि अपने हत्यारे के प्रति घृणा।


यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है।


क्योंकि गांधीजी किसी काल्पनिक परिस्थिति की चर्चा मात्र नहीं कर रहे थे।


वे जानते थे कि उनके विरुद्ध हिंसा का खतरा वास्तविक है।


उनके ऊपर पहले भी हमले के प्रयास हो चुके थे।


फिर भी उन्होंने अपने संभावित हत्यारे के प्रति घृणा को अपने भीतर स्थान देने से इनकार करने की बात कही।


यहीं से यह अनुमान मजबूत होता है कि यदि उन्हें अपने हत्यारे से दोबारा मिलने का कोई अवसर मिलता, तो उनका पहला भाव प्रतिशोध का नहीं, बल्कि क्षमा का हो सकता था।



गांधीजी के लिए क्षमा कमजोरी नहीं थी


आज सामान्य जीवन में क्षमा को कई बार कमजोरी समझ लिया जाता है।


लोग कहते हैं—


"जिसने तुम्हें चोट पहुँचाई, उसे माफ मत करो।"


"बदला लेना चाहिए।"


"उसे उसी तरह जवाब दो।"


लेकिन गांधीजी की दृष्टि बिल्कुल अलग थी।


उनके लिए क्षमा का अर्थ यह नहीं था कि व्यक्ति में प्रतिरोध की शक्ति नहीं है।


बल्कि उनके अनुसार वास्तविक क्षमा वही कर सकता है जिसके भीतर प्रतिरोध करने की शक्ति हो, लेकिन वह प्रतिशोध का रास्ता चुनने से इनकार करता हो।


इसलिए गांधीजी की अहिंसा कायरता नहीं थी।


उनकी अहिंसा का अर्थ था—


मैं तुम्हारे अन्याय का विरोध करूंगा, लेकिन तुम्हारे प्रति घृणा को अपने भीतर स्थायी स्थान नहीं दूंगा।


यह एक बहुत कठिन नैतिक स्थिति है।


किसी अन्याय का विरोध करना आसान है।


उस व्यक्ति से घृणा न करना, जिसने अन्याय किया है—यह कहीं अधिक कठिन है।



गोडसे को क्षमा करना गोडसे के विचारों को स्वीकार करना नहीं होता


यह बात विशेष रूप से स्पष्ट करना आवश्यक है।


मान लीजिए कि गांधीजी गोडसे से मिलते और कहते—


"मैं तुम्हें क्षमा करता हूं।"


इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं होता कि वे कहते—


"तुमने मुझे मारकर सही किया।"


या—


"तुम्हारी राजनीतिक विचारधारा सही थी।"


या—


"मेरी हत्या उचित थी।"


क्षमा और सहमति दो अलग-अलग चीजें हैं।


एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के अपराध को गलत मानते हुए भी उसे क्षमा कर सकता है।


वह कह सकता है—


"तुमने जो किया, वह गलत था; लेकिन मैं तुम्हारे प्रति घृणा को अपने जीवन का अंतिम सत्य नहीं बनने दूंगा।"


यही गांधीवादी विचार का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है।



गांधीजी प्रतिशोध के चक्र को तोड़ना चाहते थे


गांधीजी की चिंता केवल व्यक्तिगत हिंसा तक सीमित नहीं थी।


वे हिंसा के उस चक्र को समझते थे जिसमें एक हिंसा दूसरी हिंसा को जन्म देती है।


एक व्यक्ति की हत्या होती है।


उसके परिवार में बदले की भावना पैदा होती है।


फिर दूसरा व्यक्ति मारा जाता है।


फिर उसका परिवार बदला लेना चाहता है।


धीरे-धीरे मूल घटना पीछे छूट जाती है और प्रतिशोध स्वयं एक नई शक्ति बन जाता है।


गांधीजी इसी चक्र को तोड़ना चाहते थे।


उनके लिए हत्या का उत्तर हत्या नहीं हो सकता था।


क्योंकि अगर हर हत्या का उत्तर दूसरी हत्या है, तो समाज कभी हिंसा से बाहर नहीं निकल सकता।


इसलिए गांधीजी का विचार था कि मनुष्य को उस बिंदु पर रुकना होगा जहाँ वह कह सके—


"यह हिंसा मेरे साथ हुई है, लेकिन मैं इसे आगे नहीं बढ़ाऊंगा।"



गांधीजी की अंतिम परीक्षा


गांधीजी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक यह थी कि उन्होंने अपनी विचारधारा को केवल पुस्तकों में नहीं रखा।


उनका जीवन ही उनका प्रयोग था।


वे सत्य के साथ प्रयोग करते थे।


वे अहिंसा के साथ प्रयोग करते थे।


वे उपवास को सामाजिक और नैतिक साधन के रूप में प्रयोग करते थे।


और उनके जीवन का अंतिम चरण उनकी अहिंसा की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया।


यदि कोई व्यक्ति हिंसा के विरुद्ध जीवनभर बोलता है, तो उसके लिए वास्तविक परीक्षा तब आती है जब हिंसा स्वयं उसके सामने खड़ी हो जाती है।


गांधीजी के लिए यह परीक्षा केवल यह नहीं थी कि—


क्या मैं किसी को मारूंगा?


बल्कि यह भी थी—


क्या मैं किसी से घृणा करूंगा?


यही अंतर गांधीजी को केवल एक राजनीतिक नेता से अलग करता है।


उनकी राजनीति का एक बड़ा हिस्सा नैतिक प्रयोग था।



यदि गोडसे पश्चाताप करता तो?


अब इस काल्पनिक परिस्थिति को थोड़ा आगे बढ़ाइए।


मान लीजिए कि गोडसे गांधीजी के सामने आता और कहता—


"मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई। मैंने घृणा और अपने विचारों के कारण एक मनुष्य की हत्या कर दी। मुझे अपने कृत्य का पश्चाताप है।"


ऐसी स्थिति में गांधीजी का व्यवहार कैसा होता?


हम निश्चित रूप से नहीं जानते।


लेकिन गांधीजी के जीवन-दर्शन को देखते हुए यह अनुमान किया जा सकता है कि वे व्यक्ति के भीतर परिवर्तन की संभावना को समाप्त नहीं करते।


गांधीजी के लिए मनुष्य केवल उसके एक कर्म से परिभाषित होने वाली वस्तु नहीं था।


मनुष्य बदल सकता है।


मनुष्य पश्चाताप कर सकता है।


मनुष्य अपने विचारों की समीक्षा कर सकता है।


और मनुष्य अपने भीतर की हिंसा से बाहर निकल सकता है।


इसलिए संभव है कि गांधीजी गोडसे से उसके अपराध का सत्य स्वीकार करने को कहते और उसके पश्चाताप को स्वीकार करते।


लेकिन इसका अर्थ उसके कृत्य को उचित मानना नहीं होता।



गांधीजी शायद उससे एक प्रश्न पूछते


यदि हम इस काल्पनिक मुलाकात की कल्पना करें, तो संभवतः गांधीजी की पहली प्रतिक्रिया बदले की नहीं होती।


शायद वे पूछते—


"तुमने ऐसा क्यों किया?"


और फिर—


"क्या तुम्हें आज भी लगता है कि तुमने सही किया?"


गांधीजी के लिए सत्य अत्यंत महत्वपूर्ण था।


वे शायद गोडसे को अपने ही अंतर्मन के सामने खड़ा करते।


क्योंकि कभी-कभी दंड से अधिक कठिन चीज होती है—अपने किए हुए कर्म का नैतिक सामना करना।


एक व्यक्ति जेल जा सकता है।


दंड भुगत सकता है।


लेकिन अपने अंतर्मन से भागना कठिन है।


और सच्चा पश्चाताप वहीं से शुरू होता है।




क्षमा का अर्थ अपराध को भूल जाना नहीं है


यहाँ एक और महत्वपूर्ण अंतर है।


क्षमा का अर्थ इतिहास को मिटा देना नहीं है।


यदि गांधीजी गोडसे को क्षमा कर देते, तो इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि गांधीजी की हत्या हुई थी।


इससे हत्या की गंभीरता समाप्त नहीं होती।


इससे उस हत्या के राजनीतिक और सामाजिक परिणाम समाप्त नहीं होते।


इससे भारत के इतिहास का वह अध्याय मिट नहीं जाता।


क्षमा इतिहास को बदलती नहीं।


क्षमा केवल उस इतिहास के प्रति मनुष्य की आंतरिक प्रतिक्रिया को बदल सकती है।


यही कारण है कि क्षमा और न्याय को एक-दूसरे का विरोधी समझना आवश्यक नहीं है।



न्याय और प्रतिशोध में अंतर


किसी समाज को अपराध की जांच करने, अपराधी को कानून के सामने लाने और कानून के अनुसार दंड देने का अधिकार है।


यह न्याय की व्यवस्था का हिस्सा है।


लेकिन प्रतिशोध कुछ और है।


प्रतिशोध कहता है—


"तुमने मुझे चोट पहुंचाई, इसलिए मैं तुम्हें चोट पहुंचाऊंगा।"


न्याय कहता है—


"तुमने अपराध किया है, इसलिए कानून के अनुसार तुम्हारी जवाबदेही तय होगी।"


और क्षमा कह सकती है—


"मैं तुम्हारे अपराध को गलत मानते हुए भी अपने जीवन को घृणा से नियंत्रित नहीं होने दूंगा।"


ये तीनों अवधारणाएं अलग हैं।


गांधीजी की व्यक्तिगत क्षमा का अर्थ यह नहीं होता कि समाज में कानून समाप्त हो जाना चाहिए।




क्या गांधीजी ऐसे व्यक्ति को क्षमा करते जो पश्चाताप नहीं करता?


यह प्रश्न अधिक कठिन है।


यदि गोडसे कहता कि—


"मैंने जो किया, वह सही किया और मुझे कोई पछतावा नहीं है,"


तो गांधीजी क्या करते?


इसका निश्चित उत्तर इतिहास में नहीं है।


लेकिन इतना कहा जा सकता है कि गांधीजी किसी गलत विचार को केवल इसलिए सही नहीं मान लेते क्योंकि वे व्यक्ति को क्षमा कर सकते थे।


वे अपराध और अपराधी में अंतर करते थे।


वे व्यक्ति के प्रति घृणा न रखते हुए भी उसके विचारों का कठोर विरोध कर सकते थे।


इसलिए गांधीवादी क्षमा का अर्थ यह नहीं कि सत्य का त्याग कर दिया जाए।


बल्कि वास्तविक क्षमा के साथ सत्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।



गांधीजी शायद गोडसे को क्षमा कर देते, लेकिन गोडसेवाद को नहीं


शायद इस पूरे प्रश्न को समझने का सबसे सरल तरीका यही है—


गांधीजी गोडसे को क्षमा कर सकते थे, लेकिन गोडसे की विचारधारा को स्वीकार नहीं करते।


वे व्यक्ति को क्षमा कर सकते थे।


कर्म की निंदा कर सकते थे।


घृणा को अस्वीकार कर सकते थे।


और सत्य पर अपना आग्रह बनाए रख सकते थे।


यह चारों बातें एक साथ संभव हैं।


यही गांधीजी के दर्शन की जटिलता है।



गांधीजी की क्षमा का अर्थ क्या होता?


कल्पना कीजिए कि गांधीजी गोडसे के सामने खड़े हैं।


एक तरफ वह व्यक्ति है जिसने उनके जीवन का अंत किया।


दूसरी तरफ गांधीजी हैं, जिन्होंने अपना पूरा जीवन अहिंसा और क्षमा की बात करते हुए बिताया।


यदि गांधीजी उसे क्षमा कर देते, तो वह क्षमा शायद गोडसे के लिए जितनी महत्वपूर्ण होती, उससे कहीं अधिक गांधीजी की अपनी विचारधारा के लिए महत्वपूर्ण होती।


क्योंकि तब गांधीजी यह सिद्ध कर रहे होते कि—


हिंसा शरीर को समाप्त कर सकती है, लेकिन उसे सत्य और करुणा की हत्या करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।


गोडसे गांधीजी के शरीर को समाप्त कर सकता था।


लेकिन गांधीजी के भीतर की अहिंसा को समाप्त करने के लिए गांधीजी को स्वयं घृणा स्वीकार करनी पड़ती।


और गांधीजी शायद ऐसा नहीं करते।



सबसे बड़ी विडंबना


यहाँ इतिहास की एक गहरी विडंबना दिखाई देती है।


गोडसे ने गांधीजी के जीवन को समाप्त किया।


लेकिन यदि गांधीजी अपने अंतिम क्षण तक अहिंसा और क्षमा पर कायम रहे, तो गोडसे गांधीजी के शरीर को तो समाप्त कर सकता था, गांधीजी के दर्शन को नहीं।


गांधीजी के लिए अंतिम विजय शायद प्रतिशोध में नहीं होती।


वह इस बात में होती कि जिस हिंसा ने उनका जीवन समाप्त किया, वह उनके भीतर घृणा पैदा करने में सफल न हो।


अर्थात—


हिंसा ने शरीर को हराया, लेकिन यदि घृणा को स्वीकार नहीं किया गया, तो वह आत्मा को नहीं हरा सकी।



क्या यही गांधीजी की सबसे बड़ी शक्ति थी?


गांधीजी को समझने के लिए शायद हमें उनके राजनीतिक निर्णयों से आगे जाना होगा।


वे एक जटिल ऐतिहासिक व्यक्तित्व थे।


उनके विचारों से असहमति हो सकती है।


उनकी राजनीति की आलोचना की जा सकती है।


उनके निर्णयों पर बहस हो सकती है।


लेकिन क्षमा और अहिंसा के प्रश्न पर उनका जीवन एक अलग प्रकार का प्रयोग प्रस्तुत करता है।


उन्होंने कहा कि हिंसा का जवाब हिंसा देकर मनुष्य अंततः उसी चक्र में फंस जाता है।


उन्होंने यह भी माना कि क्षमा कायरता नहीं, बल्कि शक्ति का रूप हो सकती है।


और अपने अंतिम दिनों में वे अपने संभावित हत्यारे के प्रति भी घृणा से बचने की बात कर रहे थे।


इन सबको साथ रखकर देखें तो यह अनुमान असंगत नहीं लगता कि वे गोडसे के प्रति भी क्षमा का भाव रख सकते थे।



लेकिन यह इतिहास नहीं, एक नैतिक अनुमान है


यहाँ एक जिम्मेदार ऐतिहासिक सीमा बनाए रखना आवश्यक है।


हम यह नहीं कह सकते—


"गांधीजी ने गोडसे को क्षमा कर दिया था।"


क्योंकि गांधीजी की मृत्यु के बाद ऐसी कोई मुलाकात हुई ही नहीं।


हम केवल यह कह सकते हैं—


"गांधीजी के जीवन, उनके अंतिम दिनों के कथनों और क्षमा तथा अहिंसा पर उनके विचारों के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वे गोडसे को व्यक्तिगत रूप से क्षमा करने की ओर झुकते।"


विशेषकर यदि गोडसे पश्चाताप करता और अपने अपराध को स्वीकार करता, तो गांधीजी के दर्शन के भीतर उसके लिए क्षमा की संभावना समझ में आती है।


लेकिन यह एक व्याख्या और नैतिक अनुमान है, प्रमाणित ऐतिहासिक घटना नहीं।



असली प्रश्न गांधी और गोडसे से कहीं बड़ा है


शायद इस पूरे प्रश्न का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा गांधीजी या गोडसे नहीं हैं।


असल प्रश्न हम हैं।


हमारे सामने रोज छोटे-छोटे रूपों में यही प्रश्न आते हैं।


कोई हमें धोखा देता है।


कोई हमारा अपमान करता है।


कोई हमें छोड़ देता है।


कोई हमारे विश्वास को तोड़ता है।


कोई हमारे साथ अन्याय करता है।


तब हम क्या करते हैं?


क्या हम उस घटना को अपने भीतर वर्षों तक लेकर चलते हैं?


क्या हम बदला लेने की इच्छा में अपना वर्तमान खो देते हैं?


क्या हम सामने वाले के अपराध को अपने चरित्र का हिस्सा बनने देते हैं?


या हम यह कह पाते हैं—


"तुमने गलत किया, लेकिन मैं तुम्हारी गलती को अपनी आत्मा पर शासन नहीं करने दूंगा।"


यही गांधीवादी क्षमा का सबसे कठिन और शायद सबसे सुंदर रूप है।



क्षमा का अर्थ हारना नहीं है


हम अक्सर सोचते हैं कि जिसने बदला नहीं लिया, वह हार गया।


लेकिन गांधीजी की दृष्टि में कहानी उलटी हो सकती है।


यदि किसी ने आपको चोट पहुंचाई और आपने उसके जवाब में वही किया, तो उसने आपके व्यवहार को नियंत्रित कर लिया।


लेकिन यदि आपने अन्याय का विरोध किया, न्याय की मांग की, सत्य पर कायम रहे और फिर भी घृणा को अपने भीतर स्थायी स्थान नहीं दिया, तो आपने अपने ऊपर उसका नियंत्रण स्वीकार नहीं किया।


इस अर्थ में क्षमा कभी-कभी प्रतिशोध से अधिक शक्तिशाली हो सकती है।


क्योंकि प्रतिशोध कहता है—


"तुमने मुझे बदल दिया।"


क्षमा कहती है—


"तुमने मेरे साथ जो किया, वह गलत था; लेकिन मैं तय करूंगा कि उसके बाद मुझे कैसा मनुष्य बनना है।"



निष्कर्ष: शायद गांधीजी का उत्तर कुछ ऐसा होता


हम नहीं जानते कि मृत्यु के बाद यदि गांधीजी और गोडसे की मुलाकात होती तो गांधीजी के ठीक शब्द क्या होते।


लेकिन गांधीजी के जीवन-दर्शन को देखते हुए एक बात की कल्पना की जा सकती है।


शायद गांधीजी गोडसे से कहते—


"तुमने जो किया, वह गलत था। तुमने मेरे जीवन का अंत किया। तुम्हारे कर्म को सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन मैं तुम्हारे प्रति घृणा लेकर नहीं जीना चाहता। मैं तुम्हें क्षमा करता हूं।"


यह क्षमा हत्या को उचित नहीं बनाती।


यह गोडसे की विचारधारा को स्वीकार नहीं करती।


यह इतिहास को बदलती नहीं।


यह न्याय की आवश्यकता को समाप्त नहीं करती।


यह केवल एक बात कहती है—


मैं तुम्हारे अपराध को अपने भीतर घृणा के रूप में जीवित नहीं रखूंगा।


शायद यही गांधीजी की अहिंसा का सबसे गहरा अर्थ था।


अहिंसा केवल किसी को न मारने का नाम नहीं थी।

अहिंसा उस घृणा को भी अपने भीतर स्थान न देने का नाम थी, जो दूसरे की हिंसा हमारे भीतर पैदा करना चाहती है।


और शायद इसी कारण, यदि गांधीजी को अपने हत्यारे से मृत्यु के बाद मिलने का असंभव अवसर मिलता, तो उनके लिए सबसे गांधीवादी उत्तर बदला नहीं, बल्कि क्षमा होता।


क्योंकि गोडसे गांधीजी का शरीर समाप्त कर सकता था—


लेकिन गांधीजी को गांधी बनाए रखने वाली करुणा, सत्य और अहिंसा को नहीं।

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