दुविधा में भारत: पूँजीवाद, आधुनिकता और अपनी सभ्यतागत जड़ों की तलाश

 

दुविधा में भारत: पूँजीवाद, आधुनिकता और अपनी सभ्यतागत जड़ों की तलाश

भारत आज एक गहरे सभ्यतागत मोड़ पर खड़ा है।

एक ओर वह तीव्र आर्थिक विकास, उद्यमिता, तकनीक, वैश्वीकरण, निजी निवेश और बाजार-आधारित अर्थव्यवस्था की ओर तेजी से बढ़ रहा है; दूसरी ओर उसकी आत्मा उस प्राचीन सभ्यतागत परंपरा से निर्मित हुई है, जिसने मनुष्य के जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि धर्म, कर्तव्य, आत्मसंयम, करुणा, सह-अस्तित्व और आत्मबोध से भी परिभाषित किया।

यही भारत की वर्तमान दुविधा है।

हम आर्थिक रूप से अधिक पूँजीवादी होते जा रहे हैं, लेकिन हमारी सभ्यतागत चेतना केवल पूँजी संचय की चेतना नहीं रही है। पश्चिमी संस्कृति और जीवन-शैली का प्रभाव हमारे शहरों से निकलकर छोटे कस्बों और गाँवों तक पहुँच चुका है। उपभोग, ब्रांड, आय, संपत्ति, प्रतिष्ठा और व्यक्तिगत सफलता आधुनिक जीवन के महत्वपूर्ण प्रतीक बन चुके हैं।

लेकिन प्रश्न यह है—

क्या भारत आधुनिक बनते हुए अपनी आत्मा को बचा पाएगा?

क्या वह आर्थिक रूप से समृद्ध होकर भी आध्यात्मिक रूप से निर्धन होने से बच सकता है?

क्या वह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की आकांक्षा रखते हुए भी यह याद रख सकता है कि मनुष्य का मूल्य केवल उसकी आय, संपत्ति या बाजार में उसकी उपयोगिता से निर्धारित नहीं होता?

शायद भारत के सामने आज सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है।

भारत और सामाजिक उत्तरदायित्व की परंपरा

भारत की आधुनिक राजनीतिक व्यवस्था में सामाजिक न्याय और आर्थिक समानता का विचार महत्वपूर्ण रहा है। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में 1976 में “समाजवादी” शब्द जोड़ा गया, जो राज्य की सामाजिक और आर्थिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को अभिव्यक्त करता है।

लेकिन भारत में सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना केवल आधुनिक राजनीतिक शब्दावली की देन नहीं है।

भारतीय चिंतन में धर्म, सेवा, लोकसंग्रह, करुणा, त्याग, संयम और कर्तव्य जैसे विचार बहुत पुराने हैं। भारतीय दर्शन बार-बार इस प्रश्न से जूझता रहा है कि मनुष्य केवल अपने लिए क्यों जिए और समाज के प्रति उसका क्या दायित्व है।

हालाँकि भारत का अतीत किसी आदर्श या पूर्ण समाज का इतिहास नहीं था। भारतीय समाज में जातिगत असमानताएँ, सामाजिक भेदभाव, स्त्री-वंचना और अनेक प्रकार की ऐतिहासिक विसंगतियाँ भी रही हैं। इसलिए अपनी जड़ों की ओर लौटने का अर्थ अतीत की हर चीज को स्वीकार कर लेना नहीं हो सकता।

जड़ों की ओर लौटने का अर्थ अतीत की पूजा नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे उन मूल्यों की पुनर्खोज है जो भविष्य को बेहतर बना सकते हैं।

बाजार का बढ़ता प्रभाव

आर्थिक उदारीकरण ने भारत के आर्थिक जीवन को गहराई से बदल दिया।

निजी क्षेत्र, उद्यमिता, वैश्विक व्यापार, सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों के विस्तार ने करोड़ों भारतीयों के लिए नई संभावनाएँ पैदा की हैं।

आज छोटे शहर का एक युवा वैश्विक कंपनी में काम करने का सपना देख सकता है। वह अपना व्यवसाय शुरू कर सकता है, दुनिया के किसी भी हिस्से के ग्राहक तक पहुँच सकता है और तकनीक के माध्यम से अपनी प्रतिभा को सीमाओं से परे ले जा सकता है।

इन उपलब्धियों को नकारना उचित नहीं होगा।

बाजार, उचित नियमन और संस्थागत उत्तरदायित्व के साथ, नवाचार और आर्थिक समृद्धि का शक्तिशाली माध्यम हो सकता है।

समस्या बाजार के अस्तित्व में नहीं है।

समस्या तब शुरू होती है जब बाजार जीवन का दर्शन बन जाता है।

बाजार का उपयोग करना एक बात है और बाजार को मनुष्य के मूल्य का अंतिम निर्णायक बना देना दूसरी बात।

बाजार किसी वस्तु की कीमत निर्धारित कर सकता है।

लेकिन वह माँ के प्रेम की कीमत निर्धारित नहीं कर सकता।

वह शिक्षक का वेतन बता सकता है।

लेकिन वह यह नहीं बता सकता कि एक शिक्षक ने कितने जीवनों को बदल दिया।

वह घर का बाजार मूल्य बता सकता है।

लेकिन घर के भावनात्मक महत्व को नहीं माप सकता।

और वह सकल घरेलू उत्पाद माप सकता है।

लेकिन किसी समाज की शांति, संतोष और मानसिक समृद्धि को नहीं माप सकता।

यही वह सीमा है जिसे आधुनिक समाज को समझना होगा।

जब पैसा सफलता का पर्याय बन जाता है

समकालीन भारत में सफलता की परिभाषा तेजी से बदल रही है।

अच्छी आय, बड़ा घर, महँगी कार, प्रतिष्ठित नौकरी, ब्रांडेड वस्तुएँ, विदेश यात्राएँ और सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली जीवनशैली—ये सब सफलता के महत्वपूर्ण प्रतीक बनते जा रहे हैं।

धन बुरा नहीं है।

धन शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के लिए आवश्यक है।

समस्या धन में नहीं, बल्कि धन को जीवन का सर्वोच्च मूल्य बना देने में है।

जब हर रिश्ते को लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाने लगे, जब शिक्षा केवल नौकरी पाने का साधन बन जाए, जब पेशा केवल अधिकतम वेतन प्राप्त करने का माध्यम बन जाए और जब मनुष्य की प्रतिष्ठा उसकी आर्थिक स्थिति से निर्धारित होने लगे, तब समाज के भीतर एक गहरा परिवर्तन शुरू हो जाता है।

एक समाज आर्थिक रूप से समृद्ध हो सकता है और फिर भी भावनात्मक रूप से गरीब हो सकता है।

उसके घर बड़े हो सकते हैं, लेकिन दिल छोटे।

उसके पास तेज इंटरनेट हो सकता है, लेकिन सार्थक संवाद कम हो सकता है।

उसके पास सूचनाओं का महासागर हो सकता है, लेकिन विवेक का अभाव हो सकता है।

वह अधिक वस्तुएँ खरीद सकता है, लेकिन कम शांति पा सकता है।

यही आधुनिक उपभोक्तावादी सभ्यता का सबसे बड़ा विरोधाभास है।

पश्चिमीकरण और आधुनिकता में अंतर

भारत और पश्चिम का संबंध केवल सांस्कृतिक अनुकरण का संबंध नहीं है।

पश्चिमी दुनिया ने आधुनिक भारत को विज्ञान, आधुनिक शिक्षा, चिकित्सा, औद्योगिकीकरण, लोकतांत्रिक संस्थाओं, संवैधानिक विचार, मानवाधिकार और आधुनिक तकनीक सहित अनेक महत्वपूर्ण योगदान दिए हैं।

इन उपलब्धियों को नकारना न तो बुद्धिमानी है और न ही भारतीयता।

लेकिन आधुनिक होना और पश्चिमी हो जाना एक ही बात नहीं है।

आधुनिकीकरण का अर्थ है—विज्ञान को अपनाना, तकनीक को विकसित करना, शिक्षा का विस्तार करना, संस्थाओं को मजबूत करना और मानव क्षमताओं का विस्तार करना।

पश्चिमीकरण का अर्थ, यदि उसे उसके संकीर्ण अर्थ में लिया जाए, तो यह हो सकता है कि किसी दूसरे समाज की जीवनशैली को केवल इसलिए अपनाया जाए क्योंकि वह आधुनिक दिखाई देती है।

भारत को आधुनिक होना चाहिए।

लेकिन उसे किसी की नकल करने की आवश्यकता नहीं है।

भारत को दुनिया से सीखना चाहिए, लेकिन अपनी बौद्धिक स्वतंत्रता बनाए रखते हुए यह तय करना चाहिए कि वह क्या अपनाएगा और क्या नहीं।

इसे अंधानुकरण नहीं, रचनात्मक समन्वय की आवश्यकता है।

भारत की आध्यात्मिक चेतना

भारत की सबसे बड़ी सभ्यतागत देन शायद कोई साम्राज्य, युद्ध या स्थापत्य नहीं है।

शायद उसकी सबसे बड़ी देन एक प्रश्न है—

मनुष्य के जीवन का वास्तविक उद्देश्य क्या है?

उपनिषदों ने आत्मा और ब्रह्म के संबंध पर विचार किया। बुद्ध ने दुःख और उसके निराकरण की खोज की। जैन परंपरा ने अहिंसा और अपरिग्रह को महत्व दिया। भगवद्गीता ने कर्म, कर्तव्य, आत्मसंयम और निष्कामता पर विचार किया।

भारतीय दर्शन ने भौतिक जीवन को पूरी तरह नकारा नहीं।

भारतीय जीवन-दर्शन में पुरुषार्थों की अवधारणा में अर्थ को भी मानव जीवन का एक वैध लक्ष्य माना गया। लेकिन अर्थ अकेला लक्ष्य नहीं था। उसे धर्म, काम और मोक्ष जैसे व्यापक जीवन-मूल्यों के साथ देखा गया।

यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

भारत को गरीबी और समृद्धि में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है।

उसे चुनना है—

बिना विवेक की समृद्धि या विवेकपूर्ण समृद्धि में से।

‘पर्याप्त’ होने की कला

आधुनिक उपभोक्तावाद मनुष्य के भीतर निरंतर असंतोष पैदा करता है।

हमेशा एक नया मोबाइल है।

एक बड़ी कार है।

एक बड़ा घर है।

एक महँगी छुट्टी है।

एक बेहतर पद है।

एक अधिक प्रतिष्ठित जीवनशैली है।

और विज्ञापन हमें लगातार बताते रहते हैं कि हम अभी पर्याप्त नहीं हैं।

भारतीय दार्शनिक परंपरा इसके सामने एक दूसरी संभावना रखती है—संयम।

संयम का अर्थ महत्वाकांक्षा को समाप्त करना नहीं है।

संयम का अर्थ महत्वाकांक्षा का गुलाम न बनना है।

बेहतर जीवन की इच्छा गलत नहीं है।

लेकिन बेहतर जीवन और महँगी जीवनशैली एक ही चीज नहीं हैं।

भारत की परंपरा आधुनिक समाज को यह विवेक दे सकती है कि वह आवश्यकता और लालच, समृद्धि और अति, महत्वाकांक्षा और जुनून तथा सुविधा और वास्तविक सुख के बीच अंतर कर सके।

आर्थिक विकास और असमानता

भारत के पूँजीवादी परिवर्तन के साथ असमानता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है।

आर्थिक विकास आवश्यक है। एक गरीब देश गरीबी का रोमानीकरण नहीं कर सकता। भारत को उद्योग चाहिए, रोजगार चाहिए, निवेश चाहिए, अनुसंधान चाहिए, उद्यमिता चाहिए और उत्पादकता में वृद्धि चाहिए।

लेकिन विकास का अर्थ केवल आंकड़ों में वृद्धि नहीं हो सकता।

यदि आर्थिक विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुँचता, यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य कुछ वर्गों की सुविधा बन जाते हैं, यदि अवसर जन्म और आर्थिक स्थिति से निर्धारित होने लगते हैं, तो विकास की नैतिक सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है।

इसलिए लक्ष्य केवल होना चाहिए—

अर्थव्यवस्था की वृद्धि नहीं, बल्कि मनुष्य की क्षमताओं की वृद्धि।

एक सफल भारत वह होगा जहाँ गरीब परिवार में जन्म लेना जीवन की अंतिम सीमा न बन जाए; जहाँ गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल खरीदने की वस्तु न हो; जहाँ स्वास्थ्य सुविधा केवल आर्थिक रूप से सक्षम व्यक्ति का अधिकार न बन जाए; और जहाँ सम्मान केवल धन से निर्धारित न हो।

पूँजीवाद को नैतिकता की आवश्यकता है

भारत को पूँजीवाद समाप्त करने की आवश्यकता नहीं है।

उसे उद्यमिता, निजी निवेश, बाजार और निजी क्षेत्र की आवश्यकता है।

लेकिन बाजारों को संस्थाओं की आवश्यकता होती है और संस्थाओं को नैतिकता की।

उत्तरदायित्व के बिना पूँजी शोषण बन सकती है।

न्याय के बिना प्रतिस्पर्धा शोषक संघर्ष बन सकती है।

पर्यावरणीय चेतना के बिना उपभोग प्रकृति का विनाश कर सकता है।

नैतिक सीमाओं के बिना तकनीक मनुष्य के व्यवहार को नियंत्रित करने का साधन बन सकती है।

इसलिए भारत को ऐसी अर्थव्यवस्था की आवश्यकता है जिसमें बाजार हो, लेकिन बाजार के ऊपर समाज हो; लाभ हो, लेकिन लाभ के साथ उत्तरदायित्व भी हो।

व्यवसाय केवल शेयरधारकों के प्रति नहीं, बल्कि कर्मचारियों, उपभोक्ताओं, समाज और प्रकृति के प्रति भी जिम्मेदार होना चाहिए।

अपनी जड़ों की ओर लौटना—लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि के साथ

भारत को अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहिए।

लेकिन इसका अर्थ अतीत में लौटना नहीं है।

इसका अर्थ है—अतीत को समझकर भविष्य का निर्माण करना।

भारत को अपनी परंपराओं से ज्ञान की प्रतिष्ठा, करुणा, सेवा, आत्मसंयम, सह-अस्तित्व, अहिंसा, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता, विविधता के सम्मान और आत्मचिंतन जैसे मूल्यों को पुनः ग्रहण करना चाहिए।

साथ ही उसे उन ऐतिहासिक सामाजिक बुराइयों को दृढ़ता से अस्वीकार करना चाहिए जो मनुष्य की गरिमा के विरुद्ध हैं।

किसी सभ्यता की महानता इस बात में नहीं है कि वह अपने अतीत की हर चीज को सही साबित करे।

महान सभ्यता वह है जो अपने अतीत से संवाद कर सके।

परंपरा का सम्मान और परंपरा की आलोचना एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

वास्तव में स्वस्थ सभ्यता वही है जो स्वयं की आलोचना करने की क्षमता बनाए रखती है।

भारत को अपनी आधुनिकता स्वयं गढ़नी होगी

शायद भारत को आधुनिकता का अपना मॉडल विकसित करना होगा।

न तो दुनिया से कटकर रहने वाला भारत।

न ही किसी दूसरे समाज की नकल करने वाला भारत।

न ही अतीत की स्मृतियों में कैद भारत।

बल्कि ऐसा भारत जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक गहराई, आर्थिक महत्वाकांक्षा और सामाजिक उत्तरदायित्व, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामूहिक कल्याण, तकनीकी प्रगति और पर्यावरणीय चेतना तथा समृद्धि और करुणा के बीच संतुलन स्थापित कर सके।

ऐसा भारत पूँजीवाद को अस्वीकार नहीं करेगा।

वह उसे मानवीय बनाएगा।

वह आधुनिकता को अस्वीकार नहीं करेगा।

वह उसे अर्थपूर्ण बनाएगा।

वह वैश्वीकरण से भागेगा नहीं।

वह उसमें आत्मविश्वास के साथ भाग लेगा।

और वह अपनी सभ्यतागत विरासत को संग्रहालय में बंद करके नहीं रखेगा।

वह उसे भविष्य के निर्माण में प्रयोग करेगा।

हमें कैसा भारत बनाना है?

इक्कीसवीं सदी भारत को एक असाधारण अवसर दे रही है।

भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में स्थान बना सकता है। वह तकनीकी शक्ति बन सकता है। विज्ञान और अनुसंधान में अग्रणी भूमिका निभा सकता है। वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में अपना प्रभाव बढ़ा सकता है।

लेकिन राष्ट्रीय महानता केवल आर्थिक आकार या भू-राजनीतिक शक्ति से निर्धारित नहीं होती।

एक देश तब महान बनता है जब उसके नागरिक सम्मान के साथ जी सकें; जब समृद्धि सामाजिक संवेदना को नष्ट न करे; जब तकनीक मनुष्य की सेवा करे; जब आर्थिक विकास प्रकृति को नष्ट न करे; और जब व्यक्तिगत सफलता सामाजिक उदासीनता की कीमत पर प्राप्त न हो।

भारत को इसलिए बाजार और आध्यात्मिकता में से किसी एक को चुनने की आवश्यकता नहीं है।

उसे एक संतुलित संश्लेषण की आवश्यकता है।

धन हो—लेकिन विवेक भी हो।

महत्वाकांक्षा हो—लेकिन संयम भी हो।

तकनीक हो—लेकिन मानवीयता भी हो।

प्रतिस्पर्धा हो—लेकिन करुणा भी हो।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता हो—लेकिन सामाजिक उत्तरदायित्व भी हो।

भारत समृद्ध बने—लेकिन अपनी आत्मा को खोकर नहीं।

शायद यही अपनी जड़ों को छूकर आगे बढ़ने का वास्तविक अर्थ है।

वृक्ष अपनी जड़ों को छोड़कर ऊँचा नहीं होता। वह इसलिए ऊँचा होता है क्योंकि उसकी जड़ें गहरी होती हैं और उसकी शाखाएँ आकाश की ओर बढ़ती हैं।

भारत को भी ऐसा ही होना होगा।

उसे भविष्य की ओर बढ़ना है, लेकिन अपनी सभ्यतागत मिट्टी से संबंध बनाए रखते हुए।

उसे दुनिया से सीखना है, लेकिन अपनी पहचान खोए बिना।

उसे पूँजी बनानी है, लेकिन मनुष्य को पूँजी में बदलना नहीं है।

उसे आधुनिक होना है, लेकिन अपनी आत्मा को आधुनिकता की कीमत नहीं बनाना है।

और अंततः भारत की सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि वह कितना धनवान राष्ट्र बनेगा।

उससे बड़ा प्रश्न यह है कि—

वह कितना मानवीय राष्ट्र बनेगा।

क्योंकि सभ्यता की अंतिम सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने मनुष्य के पास कितनी वस्तुएँ पहुँचा दीं।

उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने मनुष्य को कितना बेहतर मनुष्य बनाया।

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