पिया, देखो न मुझे...
पिया, देखो न मुझे...
रुपेश रंजन
पिया, देखो न मुझे, मैं कब से तुम्हें निहारती हूँ, तुम्हारी आँखों में अपना संसार, अपनी सारी खुशियाँ सँवारती हूँ।
पिया, देखो न मुझे, इन नयनों में कितना प्यार भरा है, होंठों पर खामोशी ठहरी है, पर दिल ने तुम्हारा नाम पढ़ा है।
ज़रा पास आकर बैठो न, कुछ दिल की बातें होने दो, जो अरसे से छुपा रखा है, उसे आज आँखों से कहने दो।
मेरी चूड़ियों की खनक में, तुम्हारे आने की आहट है, मेरी साँसों की हर लय में, बस तुम्हारी ही चाहत है।
पिया, देखो न मुझे, मैं आज कुछ ऐसी सजी हूँ, जैसे सावन की पहली बूँद से, धरती की प्यास बुझी हो।
मेरी बिंदी में चाँद खिला है, मेरी पायल में राग पिया, मेरे काजल की हर रेखा में, बसता है अनुराग पिया।
तुम छू लो तो फूल महकें, तुम हँस दो तो शाम सँवरे, तुम थाम लो जो हाथ मेरा, मेरे सारे मौसम निखरें।
तुम्हारी एक नज़र की ख़ातिर, कितनी रातें जागी हूँ, तुमसे मिलने के सपनों में, कितनी बार सुहागी हूँ।
न चाँदी माँगूँ, न सोना, न महलों का उपहार पिया, बस जब दुनिया मुझे न देखे, तुम कर लेना दीदार पिया।
जब थककर घर लौटो तुम, मैं तुम्हारी थकन चुरा लूँ, तुम अपना सारा दुःख कह देना, मैं पलकों में रात बसा लूँ।
पिया, देखो न मुझे, यह प्रेम कोई क्षणिक ख़ुमार नहीं, तुम मेरे जीवन की कविता हो, जिसका कोई अंतिम छंद नहीं।
मेरी हर सुबह तुमसे रोशन, हर शाम तुम्हारे नाम रहे, इस जन्म की हर धड़कन पर, बस तुम्हारा अधिकार रहे।
पिया, देखो न मुझे ज़रा, इन आँखों में उतरकर देखो, मैं तुम्हें कितना चाहती हूँ, मेरे मौन को पढ़कर देखो।
तुम्हें माँगती नहीं सितारों से, न चाँद से कोई फ़रियाद करूँ, तुम सामने रहो बस मेरे, मैं हर पल तुमसे इश्क़ करूँ।
पिया, देखो न मुझे... आज दिल की इतनी-सी आस है, तुम्हारी नज़र मुझ पर ठहर जाए, बस इतनी-सी प्रेम-प्यास है।
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