टहनियों के टूटने से पेड़ नहीं मरा करते

टहनियों के टूटने से पेड़ नहीं मरा करते


— रुपेश रंजन


टहनियों के टूटने से पेड़ नहीं मरा करते, कुछ दर्द उम्र भर सीने में रहा करते हैं। हर ज़ख़्म की नुमाइश ज़रूरी तो नहीं, कुछ घाव ख़ामोशी में भी हरा करते हैं।


जिसने धूप में जलकर दूसरों को छाँव दी, उसके हिस्से में अक्सर तपती दोपहर आई। जिसने अपने हिस्से के फूल भी बाँट दिए, उसकी क़िस्मत में कई बार ख़िज़ाँ ही आई।


मगर पेड़ ने कभी अपनी जड़ों से शिकायत नहीं की, कभी मिट्टी से अपने रिश्ते की रुसवाई नहीं की। टूटकर गिरती रहीं शाख़ें एक-एक करके, उसने फिर भी जीने की लड़ाई नहीं छोड़ी।


कुछ अपने थे, जो मौसम की तरह बदल गए, कुछ ख़्वाब थे, जो आँखों में ही बिखर गए। जिन्हें सीने से लगाकर उम्र गुज़ार दी हमने, वही वक़्त आने पर अजनबी बनकर गुज़र गए।


किससे कहें कि भीतर कितनी वीरानी है, चेहरे पर हँसी है, आँखों में कितना पानी है। लोग पूछते हैं— तुम इतने ख़ामोश क्यों हो? उन्हें क्या बताएँ, ख़ामोशी भी एक कहानी है।


हमने भी चाहा था कोई हमें समझने वाला हो, हमारी चुप्पी पढ़े, दर्द को सुनने वाला हो। हर बार मज़बूत बने रहे दुनिया के सामने, काश! कोई होता, जिसके सामने रोने का मन होता।


कितनी बार भीतर से टूटकर भी सँभले हैं, कितनी रातों के अँधेरों में अकेले जले हैं। लोगों ने सिर्फ़ हमारी मुस्कान देखी है, हम किन राख़ होते लम्हों से गुज़रे हैं, कहाँ जाने हैं!


मगर सुनो, ऐ वक़्त! इतना भी सितम मत कर, हर टूटे हुए ख़्वाब को जीने की सज़ा मत कर। हमने बहुत कुछ खोया है, फिर भी बाक़ी हैं, हमारी रूह को इतना भी बेआवाज़ मत कर।


हाँ, कुछ शाख़ें अब कभी लौटकर नहीं आएँगी, कुछ यादें उम्र भर आँखों को भिगो जाएँगी। कुछ लोग दिल में रहेंगे, मगर ज़िंदगी में नहीं, कुछ दूरियाँ आख़िरी साँस तक सताएँगी।


फिर भी जड़ों में अभी थोड़ी नमी बाक़ी है, इस उजड़े हुए मन में कहीं ज़िंदगी बाक़ी है। अभी आख़िरी पत्ता भी गिरा नहीं है मेरा, मेरी ख़ामोश रूह में कुछ आग बाक़ी है।


टहनियों के टूटने से पेड़ नहीं मरा करते, दर्द की आँधी में हौसले नहीं बिखरा करते। जिनकी जड़ें गहरी हों रिश्तों की मिट्टी में, वे टूट तो जाते हैं, मगर मिटा नहीं करते।


और अगर कभी मेरी हरियाली नज़र न आए, अगर मेरी आँखों में कोई ख़्वाब नज़र न आए, तो यह मत समझना कि मैं जीना भूल गया हूँ, हो सकता है, मैं अपने ही भीतर पतझड़ जी रहा हूँ।


क्योंकि पेड़ होना भी कोई आसान बात नहीं— हर आने वाले को छाँव देना, ख़ुद धूप में रहना, सबके हिस्से में फूल और फल छोड़ जाना, और अपने हिस्से के दर्द को चुपचाप सहना।


टहनियाँ टूट गईं तो क्या हुआ, मेरा वजूद अभी बाक़ी है, मेरी जड़ों में दबी हुई सदियों की प्यास अभी बाक़ी है। मैं गिरूँगा भी तो मिट्टी को उपजाऊ कर जाऊँगा— मैं पेड़ हूँ साहब, मुझमें फिर से उग आने की आस अभी बाक़ी है।

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