दुर्गा पूजा में वह फिर दिखी...
### दुर्गा पूजा में वह फिर दिखी
न जाने कितने बरसों बाद, वह दुर्गा पूजा में दिखी, भीड़ वही थी, रौनक वही थी, बस ज़िंदगी कुछ बदली-बदली थी।
वही चेहरा, वही आँखें, वही ख़ामोशी का नूर, मेरा दिल वहीं ठहर गया, जहाँ से हुए थे हम कभी दूर।
वह शायद मुझे भूल चुकी थी, या यादों को कहीं दफ़्न कर चुकी थी, जिसकी एक झलक को तरसता था दिल, वह मेरे सामने थी, मगर अजनबी-सी।
मैंने चाहा कि कुछ कह दूँ, कुछ पुराने लम्हे फिर से जी लूँ, पूछ लूँ उससे उन दिनों का हिसाब, या बस एक नज़र में अपना दर्द पी लूँ।
मगर कुछ रिश्ते आवाज़ नहीं देते, कुछ अपने लौटकर भी साथ नहीं देते, वक़्त की धूल इतनी गहरी होती है, कि पुराने चेहरे भी पहचान नहीं देते।
वह माँ दुर्गा के दरबार में थी, मैं अपनी अधूरी कहानी में, वह शायद खुश थी अपनी दुनिया में, मैं उलझा रहा बीते हुए ज़माने में।
कितनी अजीब बात है न— जिसे भूलने में उम्र गुज़र जाए, वह एक दिन सामने यूँ आ जाए, और हम चाहकर भी कुछ न कह पाएँ।
वह चली गई होगी घर अपने, मैं भी लौट आया अपने ठिकाने, मगर उस रात नींद कहाँ आई, जाग उठे थे फिर कितने पुराने अफ़साने।
वह कितने साल बाद दिखी थी, और मैं कितने साल पीछे लौट गया। वह शायद मुझे भूल चुकी थी, और मैं उसे देखकर फिर वही हो गया।
न कोई शिकायत, न कोई सवाल, न लौटने की उम्मीद, न मिलने का ख़याल, बस एक छोटी-सी कसक दिल में रह गई— वह सामने थी, मगर हमारी न रही, और मेरी मोहब्बत वहीं की वहीं रह गई।
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