जो रह गए, वे असीम दर्द के साथ रह गए

 जो रह गए, वे असीम दर्द के साथ रह गए


— रुपेश रंजन


लोग आए, चले गए, कुछ पल ठहरे, फिर समय की धूल में ढल गए। कुछ ने मुस्कुराकर विदा ली, कुछ बिना कुछ कहे ही बदल गए। और कुछ ऐसे भी थे, जो जाते-जाते हमारे भीतर एक अधूरी उम्र छोड़ गए।


लोग आए, चले गए, मगर जो रह गए, वे कहाँ जा सके? वे तो उन्हीं स्मृतियों के उजाड़ में ठहर गए, जहाँ कभी किसी के होने से रौनक़ थी, जहाँ किसी की हँसी से सुबह होती थी, जहाँ किसी की आवाज़ में अपने होने का अर्थ मिलता था।


अब वहाँ सन्नाटा है, और सन्नाटे के भीतर एक अनंत प्रतिध्वनि— जैसे कोई पुकारता हो दूर से, जैसे कोई लौटने का वादा करके कभी लौटना ही भूल गया हो।


जो चले गए, उनके पास रास्ते थे, जो रह गए, उनके पास यादें हैं। वे आगे बढ़ गए नई मंज़िलों की ओर, हम वहीं खड़े हैं, जहाँ कभी बिछड़ने का पहला क्षण हमारी पूरी दुनिया निगल गया था।


अजीब है न यह जीवन— जाने वालों के लिए रास्ते खुलते हैं, रह जाने वालों के लिए बीते हुए समय के दरवाज़े भी बंद नहीं होते। वे हर रोज़ उसी चौखट पर लौटते हैं, जहाँ किसी ने अंतिम बार कहा था— फिर मिलेंगे।


और हम आज तक उस एक वाक्य की उम्र गिन रहे हैं।


हमेशा से यही होता आया है, सभ्यताएँ बदलीं, सदियाँ गुज़र गईं, चेहरे बदले, रिश्तों के नाम बदले, मगर बिछड़ने का व्याकरण नहीं बदला। कोई किसी को छोड़कर चला जाता है, कोई किसी के जाने के बाद भी उसे अपने भीतर से विदा नहीं कर पाता।


किसी के लिए जीवन एक नया अध्याय है, किसी के लिए वही पुराना पन्ना, जिसके कोने आँसुओं से भीग चुके हैं, जिसकी स्याही धुँधली पड़ गई है, मगर जिस पर लिखा एक नाम आज भी मिटने से इनकार करता है।


हम क्या बदल सकते हैं?


न समय को पीछे लौटा सकते हैं, न बीते हुए कल को फिर से जी सकते हैं, न किसी के हृदय में अपने लिए वही पुरानी जगह बचा सकते हैं, न मृत्यु से कह सकते हैं— थोड़ी देर और ठहर जाओ, अभी कुछ बातें अधूरी हैं।


हम केवल देख सकते हैं— अपने प्रियजनों को स्मृतियों में बदलते हुए, अपने सपनों को परिस्थितियों के आगे झुकते हुए, अपने भीतर के उस संसार को धीरे-धीरे उजड़ते हुए, जिसे हमने कभी जीवन का सबसे सुरक्षित कोना समझा था।


और शायद यही सबसे बड़ा दुःख है— दर्द का होना नहीं, दर्द को बदल न पाने की विवशता।


यह जानना कि कुछ भी पहले जैसा नहीं होगा, फिर भी मन का उसी पहले जैसे होने की असंभव प्रतीक्षा में रहना। यह समझना कि कोई लौटकर नहीं आएगा, फिर भी हर आहट पर अनायास दरवाज़े की ओर देखना।


कभी-कभी लगता है, हम जीवन नहीं जी रहे, हम केवल उन लोगों के चले जाने के बाद बचे हुए जीवन को ढो रहे हैं।


हमारे भीतर कितने लोग रहते हैं— कोई बचपन बनकर, कोई अधूरे प्रेम की तरह, कोई पिता की सीख बनकर, कोई दादा की झुर्रियों में छिपी अनुभवों की उजली किताब बनकर। वे सब अपने-अपने समय में चले गए, मगर हमारे भीतर उनकी उपस्थिति आज भी साँस लेती है।


शायद मनुष्य का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है— वह जानता है कि सब कुछ नश्वर है, फिर भी प्रेम को शाश्वत मान बैठता है। वह जानता है कि बिछड़ना निश्चित है, फिर भी किसी के साथ अनंत जीवन के सपने बुनता है।


और जब स्वप्न टूटते हैं, तो वह अपनी ही संवेदनाओं के सामने एक असहाय दर्शक बनकर रह जाता है।


लोग आएँगे, चले जाएँगे, नए रिश्ते बनेंगे, पुराने छूट जाएँगे। समय अपनी गति से चलता रहेगा, दुनिया अपनी व्यस्तताओं में खोई रहेगी। किसी के चले जाने से सूरज उगना बंद नहीं करेगा, नदियाँ बहना नहीं छोड़ेंगी, और शहरों में जीवन अपनी पूरी निर्ममता से चलता रहेगा।


बस, किसी एक हृदय में एक छोटा-सा संसार समाप्त हो जाएगा, जिसके उजड़ने की ख़बर किसी अख़बार में नहीं छपेगी।


यही तो सबसे गहरा दर्द है— दुनिया चलती रहती है, जबकि किसी के भीतर समय हमेशा के लिए ठहर जाता है।


और हम कुछ बदल नहीं सकते— न जाने वालों का निर्णय, न बीते हुए समय की दिशा, न नियति की लिखावट।


शायद हम केवल इतना कर सकते हैं कि जो रह गए हैं, उनके दर्द को थोड़ा समझें; जो हमारे पास हैं, उनसे प्रेम कहने में देर न करें; और जो जा चुके हैं, उन्हें भूलने की ज़िद करने के बजाय अपने भीतर एक सम्मानित स्थान दे दें।


क्योंकि हर विदाई विस्मृति नहीं होती, हर दूरी अंत नहीं होती, और हर टूटन के बाद मनुष्य पूरी तरह समाप्त नहीं होता।


कुछ लोग चले जाने के बाद भी हमारे आचरण में जीवित रहते हैं, हमारी भाषा में, हमारी सीख में, हमारे निर्णयों में, हमारी करुणा में।


वे लौटकर नहीं आते, मगर हमें पहले जैसा भी नहीं रहने देते।


लोग आए, चले गए— जो रह गए, वे असीम दर्द के साथ रह गए। समय ने सबको आगे बढ़ना सिखाया, मगर कुछ हृदय आज भी अपने बिछुड़े हुए कल के पास रह गए।


और शायद जीवन का सबसे मौन सत्य यही है— हम हर बिछड़ने को रोक नहीं सकते, हर पीड़ा का उपचार नहीं कर सकते, हर रिक्तता को भर नहीं सकते।


लेकिन जब तक हम किसी के दर्द को समझ सकते हैं, तब तक इस कठोर संसार में थोड़ी-सी मनुष्यता बची हुई है।

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