अब गाँव किससे मिलने जाऊँगा
अब गाँव किससे मिलने जाऊँगा
— रुपेश रंजन
वो भी चले गए,
जिनके होने से बहुत कुछ था,
अब सब कुछ होते हुए भी जैसे कुछ शेष नहीं रहा।
एक अजीब-सा सन्नाटा है भीतर, जैसे किसी ने आत्मा के आँगन से सारी आवाज़ें समेट ली हों,
और स्मृतियों के दरवाज़े पर उदासी का पहरा बिठा दिया हो।
बहुत दर्द होता है,
बार-बार आँखें भर आती हैं, अश्रुओं की अविरल धारा भी मन का बोझ कहाँ घटा पाती है?
रो लेता हूँ जी भरकर,
फिर भी वहीं खड़ा रह जाता हूँ, जैसे समय आगे बढ़ता रहता है और मैं अतीत में छूट जाता हूँ।
यह प्रहार केवल किसी व्यक्ति पर नहीं, मेरी जड़ों पर हुआ है,
वह वृक्ष,
जिसकी छाया में मैंने अपने होने का अर्थ खोजा,
आज उसी की शाखाओं पर विरह का मौसम ठहरा हुआ है।
गाँव का वह घर,
जो कभी केवल मकान नहीं था, मेरे अस्तित्व का आधार था,
मेरी स्मृतियों का संसार था,
मेरी वापसी का सबसे सुंदर कारण, मेरे होने का एक स्वीकार था।
अब वहाँ जाऊँगा तो क्या देखूँगा? दीवारें होंगी,
आँगन होगा,
वही पुराना दरवाज़ा होगा,
शायद धूप भी पहले जैसी उतरेगी, शाम को चिड़ियाँ भी लौटेंगी, लेकिन वह कौन-सी चीज़ होगी जो मुझे पहले जैसा कर देगी?
किससे मिलने जाऊँगा वहाँ?
किसे देखकर मन भर आएगा? किसकी आवाज़ सुनकर लगेगा कि कोई अपना बुलाएगा?
किसके पास बैठकर चुपचाप अपने दिन का दुख कह पाऊँगा?
किसकी आँखों में देखकर बिना कहे सब समझ जाऊँगा?
घर तो शायद अब भी घर है,
पर मेरा घर जैसा कहाँ रहा;
जिसके होने से जड़ें जीवित थीं, वह अपना ही संसार कहाँ रहा।
कभी लौटने की जल्दी रहती थी, अब लौटने का साहस जुटाता हूँ, जिस आँगन में बचपन छूटा था, वहीं अपने वर्तमान से घबराता हूँ।
जीवन की सबसे गहरी चोट शायद किसी अपने का चले जाना नहीं, बल्कि उसके बाद भी जीवित रहकर हर परिचित जगह में उसकी अनुपस्थिति को पहचानना है।
अब समझ में आता है— कुछ लोग केवल रिश्ते नहीं होते,
वे हमारे भीतर की नींव होते हैं;
वे चले जाते हैं तो हम गिरते नहीं दिखाई देते,
लेकिन भीतर कहीं हमारे होने के अर्थ दरक जाते हैं।
फिर भी, ऐ मन!
इस असीम रिक्तता के बीच उनकी स्मृतियों को मरने मत देना,
जिस प्रेम ने तुझे जड़ें दी थीं,
उस प्रेम को स्वयं से बिछुड़ने मत देना।
वे लौटकर नहीं आएँगे,
यह सत्य कितना कठोर है;
पर तेरे भीतर जो कुछ जीवित है, उसमें उनका भी अंश है,
उनकी सीख है, उनका श्रम है, उनके जीवन का उज्ज्वल स्पर्श है।
मैं फिर गाँव जाऊँगा,
भले आँखें नम होंगी,
भले आँगन में उनकी जगह एक गहरा खालीपन होगा;
मैं उस मिट्टी को छुऊँगा,
जहाँ मेरी स्मृतियों की जड़ें हैं,
और धीरे से कहूँगा—
“आप तो चले गए,
पर मैं अपनी जड़ों को कैसे छोड़ दूँ?
आपसे मिलने का समय बीत गया, पर आपकी सीख से रिश्ता कैसे तोड़ दूँ?”
अब गाँव किससे मिलने जाऊँगा— यह प्रश्न अभी भी शेष है,
शायद इसका कोई उत्तर नहीं,
शायद यही जीवन का अवशेष है।
पर जब भी उस घर की देहरी पर मेरे कदम ठहर जाएँगे,
आप दिखाई भले न दें,
आपकी स्मृतियाँ मुझे फिर भी अपना कहकर बुलाएँगी।
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