भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता: विकसित भारत की अनिवार्य राह
भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता: विकसित भारत की अनिवार्य राह
भारत आज अपने इतिहास के एक ऐसे महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसके सामने केवल आर्थिक विकास का लक्ष्य नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण का अवसर है जो समृद्ध होने के साथ-साथ संस्थागत रूप से मजबूत, प्रशासनिक रूप से पारदर्शी, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और नैतिक रूप से विश्वसनीय हो।
भारत के पास विशाल जनसंख्या, युवा कार्यबल, तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, उद्यमशीलता, वैज्ञानिक प्रतिभा, डिजिटल अवसंरचना और वैश्विक स्तर पर बढ़ता प्रभाव है। विकसित राष्ट्र बनने की उसकी आकांक्षा इसलिए केवल कल्पना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक संभावना है।
लेकिन विकसित राष्ट्र बनने का अर्थ केवल अधिक GDP, ऊँची इमारतें, चौड़ी सड़कें, आधुनिक हवाई अड्डे, तेज इंटरनेट, बड़े उद्योग और अत्याधुनिक तकनीक नहीं है।
विकास की वास्तविक गुणवत्ता इस बात से भी निर्धारित होती है कि किसी देश की संस्थाएँ कितनी ईमानदार हैं, प्रशासन कितना जवाबदेह है, कानून कितना निष्पक्ष है, सार्वजनिक धन का उपयोग कितना प्रभावी है और नागरिकों को अपनी व्यवस्था पर कितना विश्वास है।
इसीलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध संघर्ष को केवल एक प्रशासनिक या कानूनी अभियान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। इसे भारत के राष्ट्र-निर्माण और विकसित राष्ट्र बनने की प्रक्रिया का मूलभूत हिस्सा बनाना होगा।
विकास केवल GDP का नाम नहीं
GDP किसी देश की आर्थिक गतिविधियों को मापने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, लेकिन यह किसी समाज की संपूर्ण विकास-गुणवत्ता को नहीं बताता।
वास्तविक विकास में संस्थाओं की विश्वसनीयता, अवसरों की समानता, सार्वजनिक सेवाओं की गुणवत्ता, न्याय तक पहुँच, नागरिकों की गरिमा, प्रशासन की ईमानदारी, आर्थिक प्रतिस्पर्धा की निष्पक्षता और शासन में जनता का विश्वास भी शामिल हैं।
कल्पना कीजिए कि दो देशों की आर्थिक आय लगभग समान है। पहले देश में नागरिक सरकारी सेवाएँ पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से प्राप्त करते हैं, व्यवसाय योग्यता और प्रतिस्पर्धा के आधार पर आगे बढ़ते हैं, सार्वजनिक ठेके निष्पक्ष तरीके से दिए जाते हैं और सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह बनाया जाता है।
दूसरे देश में नागरिकों को सामान्य सेवाओं के लिए भी व्यक्तिगत संबंधों, प्रभाव या अनौपचारिक भुगतान पर निर्भर रहना पड़ता है। व्यवसायों के लिए नियम अस्पष्ट हैं और सार्वजनिक निर्णयों पर निजी प्रभाव हावी है।
दोनों देशों का GDP समान हो सकता है, लेकिन उनके विकास का स्तर समान नहीं होगा।
वास्तविक विकसित राष्ट्र वह है जहाँ संस्थाएँ अनुमानित, विश्वसनीय, निष्पक्ष और नागरिक-केंद्रित हों।
भ्रष्टाचार: समाज पर लगने वाला अदृश्य कर
भ्रष्टाचार को अक्सर केवल रिश्वत के रूप में समझा जाता है, जबकि इसका स्वरूप इससे कहीं व्यापक है।
सार्वजनिक पद का दुरुपयोग, भाई-भतीजावाद, पक्षपात, फर्जीवाड़ा, सार्वजनिक खरीद में अनियमितता, नियमों का जानबूझकर दुरुपयोग, हितों का टकराव, सरकारी संसाधनों का निजी उपयोग, प्रभाव का अनुचित प्रयोग और सार्वजनिक धन का गलत इस्तेमाल—ये सभी भ्रष्टाचार की व्यापक समस्या से जुड़े हो सकते हैं।
भ्रष्टाचार का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि उसका पूरा आर्थिक नुकसान तुरंत दिखाई नहीं देता।
एक नागरिक किसी सेवा के लिए अनौपचारिक भुगतान करता है। कोई व्यवसाय अनुमति जल्दी प्राप्त करने के लिए अनुचित भुगतान करता है। कोई ठेकेदार सार्वजनिक परियोजना को प्रभावित करता है। किसी योजना का धन अपने वास्तविक लाभार्थियों तक पूरी तरह नहीं पहुँचता।
प्रत्येक घटना अलग-अलग देखने पर छोटी लग सकती है।
लेकिन जब ऐसी घटनाएँ व्यापक हो जाती हैं, तो पूरा आर्थिक तंत्र प्रभावित होता है।
भ्रष्टाचार एक प्रकार का अदृश्य आर्थिक कर बन जाता है—लेकिन वैध कर की तरह इसका उपयोग सार्वजनिक हित में नहीं होता। इसके बजाय यह संसाधनों को निजी लाभ, प्रभाव और विशेष संबंधों की ओर मोड़ सकता है।
भ्रष्टाचार सबसे पहले ईमानदार व्यक्ति को दंडित करता है
भ्रष्टाचार का एक गंभीर सामाजिक परिणाम यह है कि वह बेईमानी को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदल सकता है।
एक ईमानदार उद्यमी सभी नियमों का पालन करता है और समय तथा संसाधन लगाता है। दूसरी ओर, कोई व्यक्ति व्यक्तिगत संबंधों या अनुचित प्रभाव के माध्यम से वही काम जल्दी प्राप्त कर सकता है।
एक अधिकारी नियमों का पालन करते हुए निर्णय लेने में समय लगाता है, जबकि दूसरा व्यक्ति प्रभाव के माध्यम से काम करवाने के कारण अधिक "प्रभावी" माना जा सकता है।
धीरे-धीरे समाज में एक खतरनाक धारणा जन्म लेती है—
ईमानदारी से आगे बढ़ना कठिन है।
जब यह सोच व्यापक हो जाती है, तब भ्रष्टाचार केवल व्यक्तिगत नैतिक कमजोरी नहीं रहता। वह संस्थागत संस्कृति का हिस्सा बनने लगता है।
इसलिए भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य यह होना चाहिए कि ईमानदारी को फिर से सामाजिक और आर्थिक शक्ति बनाया जाए।
सार्वजनिक प्रशासन को विश्वास का संस्थान बनाना होगा
राज्य और नागरिक के बीच सबसे प्रत्यक्ष संपर्क प्रशासन के माध्यम से होता है।
भूमि प्रशासन, कर व्यवस्था, पुलिस, स्थानीय निकाय, लाइसेंस, कल्याणकारी योजनाएँ, शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक निर्माण, सरकारी खरीद और विभिन्न नियामक संस्थाएँ नागरिकों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं।
एक स्वच्छ प्रशासन का अर्थ ऐसा प्रशासन नहीं है जिसमें अधिकारियों के पास कोई विवेकाधिकार ही न हो।
वास्तविक शासन में अनेक परिस्थितियाँ ऐसी होती हैं जहाँ अधिकारियों को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना पड़ता है।
इसलिए शून्य सहनशीलता का सही अर्थ समझना आवश्यक है:
शून्य सहनशीलता का अर्थ शून्य विवेकाधिकार नहीं है; इसका अर्थ है विवेकाधिकार के बेईमान और निजी लाभ के लिए किए गए उपयोग को स्वीकार न करना।
ईमानदार प्रशासनिक निर्णय और भ्रष्ट निर्णय में अंतर करना आवश्यक है।
किसी निर्णय से असहमति होना और उसे भ्रष्टाचार कहना एक ही बात नहीं है।
दूसरी ओर, प्रशासनिक अधिकार को निजी लाभ, पक्षपात या अनुचित प्रभाव का साधन बनाना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
भारत को ऐसी संस्थाओं की आवश्यकता है जहाँ ईमानदार अधिकारियों को संरक्षण मिले, भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जाँच हो, प्रक्रियाएँ पारदर्शी हों और निर्णयों की वैध समीक्षा संभव हो।
राजनीतिक ईमानदारी भी उतनी ही आवश्यक है
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई भी गंभीर रणनीति राजनीति की भूमिका को नजरअंदाज नहीं कर सकती।
राजनीतिक संस्थाएँ कानून बनाती हैं, बजट निर्धारित करती हैं, नीतियाँ तय करती हैं, सार्वजनिक खर्च की प्राथमिकताएँ निर्धारित करती हैं और प्रशासनिक व्यवस्था को दिशा देती हैं।
इसलिए राजनीतिक निर्णयों की गुणवत्ता और पारदर्शिता का प्रभाव पूरे शासन तंत्र पर पड़ता है।
लोकतंत्र में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा आवश्यक है, लेकिन राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को सार्वजनिक संसाधनों के निजी संरक्षण या अनुचित लाभ का माध्यम नहीं बनना चाहिए।
राजनीतिक वित्त में पारदर्शिता, हितों की उचित घोषणा, सार्वजनिक प्रतिनिधियों के लिए नैतिक मानक, संस्थागत नियंत्रण और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग की जवाबदेही एक परिपक्व लोकतंत्र के आवश्यक तत्व हैं।
यह किसी एक राजनीतिक दल या सरकार के विरुद्ध आरोप नहीं है।
भ्रष्टाचार किसी एक दल, विचारधारा, क्षेत्र, वर्ग या संस्था की समस्या नहीं है। यह एक प्रणालीगत चुनौती है।
इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था राजनीतिक रूप से निष्पक्ष और संस्थागत रूप से समान होनी चाहिए।
सत्ता में कोई भी हो, जवाबदेही के मानक समान रहने चाहिए।
डिजिटल भारत: पारदर्शी भारत की दिशा में
भारत का डिजिटल परिवर्तन भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है।
ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ई-प्रोक्योरमेंट, डिजिटल हस्ताक्षर, आधुनिक भूमि अभिलेख, ऑनलाइन ट्रैकिंग, स्वचालित प्रक्रियाएँ, सार्वजनिक डैशबोर्ड और डेटा-आधारित ऑडिट जैसी व्यवस्थाएँ अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप को कम कर सकती हैं।
जब नागरिक किसी कार्यालय में बार-बार जाने के बजाय ऑनलाइन आवेदन कर सकता है, आवेदन की स्थिति देख सकता है, डिजिटल भुगतान कर सकता है और प्रमाणित दस्तावेज प्राप्त कर सकता है, तो छोटी रिश्वत और अनावश्यक मध्यस्थता की संभावनाएँ कम हो सकती हैं।
डिजिटल व्यवस्था एक महत्वपूर्ण चीज और प्रदान करती है—ऑडिट ट्रेल।
जो निर्णय पहले केवल कागजी फाइलों में सीमित रह सकता था, वह डिजिटल प्रणाली में समय, प्रक्रिया और जिम्मेदारी के रिकॉर्ड के साथ उपलब्ध हो सकता है।
लेकिन तकनीक अपने आप में ईमानदारी की गारंटी नहीं है।
भ्रष्ट व्यवस्था तकनीक का भी दुरुपयोग कर सकती है। डेटा में हेरफेर हो सकता है, डिजिटल प्रणालियों में पक्षपात हो सकता है और निजी जानकारी का दुरुपयोग हो सकता है।
इसलिए—
तकनीक को नैतिक शासन का विकल्प नहीं, बल्कि पारदर्शी शासन का उपकरण बनाना होगा।
डिजिटल भारत तभी वास्तव में पारदर्शी भारत बनेगा जब डिजिटल व्यवस्था के साथ साइबर सुरक्षा, गोपनीयता, स्वतंत्र निगरानी, पारदर्शिता और मानवीय जवाबदेही भी मौजूद हो।
न्याय निश्चित, निष्पक्ष और समयबद्ध होना चाहिए
भ्रष्टाचार के विरुद्ध कानून तभी प्रभावी होते हैं जब उनके उल्लंघन के वास्तविक परिणाम हों।
यदि किसी व्यक्ति को विश्वास हो कि भ्रष्टाचार पकड़े जाने की संभावना कम है, जाँच वर्षों तक चल सकती है, मुकदमा लंबा चलेगा और अंतिम परिणाम अनिश्चित रहेगा, तो कानून का निवारक प्रभाव कमजोर हो जाता है।
इसलिए भ्रष्टाचार विरोधी व्यवस्था में केवल कठोर दंड पर्याप्त नहीं है।
आवश्यक है—
- निष्पक्ष जाँच,
- पेशेवर जाँच व्यवस्था,
- संस्थागत स्वतंत्रता,
- समयबद्ध प्रक्रिया,
- उचित अभियोजन,
- प्रभावी न्यायिक व्यवस्था,
- संपत्ति और हितों की पारदर्शी घोषणा,
- और कानून के अनुसार अनुपातिक दंड।
साथ ही यह भी महत्वपूर्ण है कि भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों का दुरुपयोग न हो।
भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता के साथ मनमाने या राजनीतिक रूप से प्रेरित दंड के प्रति भी शून्य सहनशीलता होनी चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार के विरुद्ध कठोरता और व्यक्ति के अधिकारों के प्रति सम्मान साथ-साथ चलना चाहिए।
भ्रष्टाचार की सामाजिक स्वीकृति बदलनी होगी
कानून आवश्यक है, लेकिन कानून अकेले भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकता।
यदि समाज में लोग बड़े घोटालों की निंदा करते रहें, लेकिन छोटे स्तर पर रिश्वत, पक्षपात, अनुचित प्रभाव और नियमों से बचने को सामान्य मानते रहें, तो भ्रष्टाचार की संस्कृति समाप्त नहीं होगी।
यहीं से नैतिक और नागरिक शिक्षा की भूमिका शुरू होती है।
परिवार बच्चों को यह सिखा सकता है कि गलत तरीके से प्राप्त सफलता वास्तविक सफलता नहीं है।
विद्यालय और विश्वविद्यालय ईमानदारी को केवल पाठ्यक्रम का विषय न बनाकर नागरिक जीवन का मूल्य बना सकते हैं।
मीडिया और साहित्य बिना जवाबदेही के धन और शक्ति के महिमामंडन पर प्रश्न उठा सकते हैं।
कार्यस्थल ईमानदार नेतृत्व और नैतिक व्यवहार को प्रोत्साहित कर सकते हैं।
नागरिक यह समझ सकते हैं कि छोटे स्तर पर नियम तोड़ना भी व्यापक संस्थागत संस्कृति को प्रभावित करता है।
कानून भ्रष्टाचार को दंडित कर सकता है; लेकिन नागरिक संस्कृति ईमानदारी को प्रतिष्ठा प्रदान कर सकती है।
व्यवसाय में रिश्वत नहीं, प्रतिस्पर्धा हो
विकसित अर्थव्यवस्था व्यक्तिगत संबंधों पर नहीं, उत्पादकता और नवाचार पर आधारित होती है।
उद्यमी की सफलता इस बात पर निर्भर होनी चाहिए कि वह कितना मूल्य पैदा करता है, कितने रोजगार देता है, कितनी अच्छी सेवा प्रदान करता है और कितनी नवीनता लाता है—न कि इस बात पर कि उसके राजनीतिक या प्रशासनिक संपर्क कितने मजबूत हैं।
भ्रष्टाचार प्रतिस्पर्धा को विकृत कर सकता है।
यह अक्षम कंपनियों को अनुचित लाभ दे सकता है और अधिक सक्षम उद्यमियों को नुकसान पहुँचा सकता है। इससे निवेश का विश्वास प्रभावित हो सकता है और व्यवसाय की लागत बढ़ सकती है।
भारत को ऐसे आर्थिक वातावरण की आवश्यकता है जिसमें—
सरल नियम हों, स्पष्ट नियमन हो, पारदर्शी सरकारी खरीद हो, निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा हो, प्रभावी विवाद समाधान हो, कॉरपोरेट जवाबदेही हो और अनावश्यक अनुपालन बोझ कम हो।
वास्तविक सुधार केवल भ्रष्टाचार होने के बाद कार्रवाई करना नहीं है।
बेहतर सुधार वह है जिसमें ऐसी संस्थागत व्यवस्था बनाई जाए जहाँ भ्रष्टाचार के अवसर ही कम हो जाएँ।
शून्य सहनशीलता का अर्थ विवेकहीन कठोरता नहीं
"Zero Tolerance" या "शून्य सहनशीलता" को भी समझदारी से परिभाषित करना आवश्यक है।
सरकारी व्यवस्था मनुष्यों द्वारा संचालित होती है। इसलिए गलतियाँ होंगी। नीतियों के अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं। अधिकारी सद्भावना से निर्णय ले सकते हैं जो बाद में सही साबित न हों।
इसलिए निम्नलिखित के बीच अंतर करना आवश्यक है—
- ईमानदार गलती और जानबूझकर किया गया भ्रष्टाचार;
- प्रशासनिक कमजोरी और आपराधिक कृत्य;
- नीति संबंधी असफलता और निजी लाभ;
- वैध विवेकाधिकार और अधिकार का दुरुपयोग;
- निर्णय से असहमति और भ्रष्टाचार।
यदि हर प्रशासनिक गलती को भ्रष्टाचार मान लिया जाए, तो ईमानदार अधिकारी निर्णय लेने से डर सकते हैं।
इससे प्रशासनिक पक्षाघात पैदा हो सकता है।
इसलिए सही सिद्धांत होना चाहिए:
जानबूझकर किए गए भ्रष्टाचार के प्रति कठोरता, लेकिन सद्भावना से की गई ईमानदार प्रशासनिक गलती के प्रति न्यायपूर्ण दृष्टिकोण।
यही संतुलन जवाबदेही और प्रशासनिक आत्मविश्वास दोनों को बनाए रख सकता है।
नागरिक केवल लाभार्थी नहीं, शासन के सहभागी हैं
भ्रष्टाचार विरोधी अभियान केवल सरकारी संस्थाओं का काम नहीं हो सकता।
नागरिक शासन के सक्रिय भागीदार हैं।
उन्हें कानून के दायरे में सूचना प्राप्त करने, शिकायत दर्ज करने, सार्वजनिक सेवाओं की निगरानी करने, स्थानीय संस्थाओं में भाग लेने और प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करने के अवसर मिलने चाहिए।
जो लोग वास्तविक भ्रष्टाचार को सामने लाते हैं, उन्हें उचित सुरक्षा मिलनी चाहिए।
एक जागरूक नागरिक व्यवस्था से केवल यह नहीं पूछता—
"मुझे क्या मिलेगा?"
वह यह भी पूछता है—
"क्या यह व्यवस्था सबके लिए निष्पक्ष है?"
यही प्रश्न लोकतंत्र को अधिक परिपक्व बनाता है।
विकसित भारत का आधार संस्थागत विश्वास है
भारत का विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य अंततः नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा हुआ है।
युवा चाहते हैं कि उन्हें योग्यता के आधार पर अवसर मिले।
उद्यमी चाहते हैं कि नियम स्पष्ट और समान हों।
कर्मचारी सम्मान और निष्पक्षता चाहते हैं।
निवेशक संस्थागत स्थिरता चाहते हैं।
करदाता चाहते हैं कि उनका पैसा सही दिशा में खर्च हो।
सामान्य नागरिक चाहता है कि न्याय प्राप्त करने के लिए उसे व्यक्तिगत प्रभाव पर निर्भर न होना पड़े।
ये विलासिता की माँगें नहीं हैं।
ये एक परिपक्व समाज की मूल अपेक्षाएँ हैं।
आर्थिक विकास संसाधन पैदा करता है, लेकिन संस्थागत ईमानदारी यह निर्धारित करती है कि उन संसाधनों का उपयोग कितनी प्रभावशीलता से होगा।
इसीलिए भ्रष्टाचार केवल शासन की समस्या नहीं है।
भ्रष्टाचार विकास की भी समस्या है।
भारत के लिए शून्य-सहनशीलता का राष्ट्रीय ढाँचा
भारत को भ्रष्टाचार के विरुद्ध अलग-अलग और असंबद्ध अभियानों के बजाय एक व्यापक राष्ट्रीय ढाँचे की आवश्यकता है।
इस ढाँचे के कुछ प्रमुख आधार हो सकते हैं:
1. पारदर्शी शासन
सरकारी प्रक्रियाएँ सरल, स्पष्ट, ट्रैक करने योग्य और उचित सीमा तक सार्वजनिक निगरानी के योग्य होनी चाहिए।
2. प्रक्रियाओं का सरलीकरण
अनावश्यक अनुमति और जटिलता भ्रष्टाचार के लिए अतिरिक्त अवसर पैदा कर सकती है।
3. डिजिटल जवाबदेही
डिजिटल प्रणालियों का उपयोग केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि रिकॉर्ड, पारदर्शिता और ऑडिट के लिए भी होना चाहिए।
4. मजबूत संस्थाएँ
निगरानी और भ्रष्टाचार-रोधी संस्थाओं के पास पर्याप्त पेशेवर क्षमता और उपयुक्त संस्थागत स्वतंत्रता होनी चाहिए।
5. समयबद्ध न्याय
जाँच और न्यायिक प्रक्रिया प्रभावी तथा समयबद्ध होनी चाहिए, साथ ही प्राकृतिक न्याय और विधिक अधिकारों का सम्मान होना चाहिए।
6. ईमानदार अधिकारियों का संरक्षण
सद्भावना से निर्णय लेने वाले अधिकारियों को अनुचित उत्पीड़न से सुरक्षा मिलनी चाहिए।
7. व्हिसलब्लोअर संरक्षण
वास्तविक भ्रष्टाचार उजागर करने वाले लोगों को प्रतिशोध से उचित सुरक्षा मिलनी चाहिए।
8. पारदर्शी सार्वजनिक खरीद
सरकारी ठेकों और खरीद प्रक्रियाओं में प्रतिस्पर्धा, गुणवत्ता और सार्वजनिक धन के सर्वोत्तम उपयोग को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
9. नैतिक राजनीतिक शासन
राजनीतिक शक्ति संवैधानिक मर्यादाओं, लोकतांत्रिक जवाबदेही और सार्वजनिक हित से बंधी रहनी चाहिए।
10. नागरिक नैतिकता
ईमानदारी को केवल कानून का विषय नहीं, बल्कि नागरिक चरित्र का हिस्सा बनाना होगा।
इन सभी क्षेत्रों में सुधार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। किसी एक क्षेत्र की कमजोरी दूसरे क्षेत्रों की उपलब्धियों को भी कमजोर कर सकती है।
विकसित भारत की वास्तविक कसौटी
सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि भारत अधिक समृद्ध बन सकता है या नहीं।
भारत ने पहले ही यह दिखा दिया है कि वह विकास, नवाचार, विज्ञान, तकनीक और उद्यमिता में आगे बढ़ सकता है।
वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी आकांक्षाओं के अनुरूप संस्थाओं का निर्माण कर सकता है।
क्या नागरिक बिना व्यक्तिगत प्रभाव के वैध सरकारी सेवा प्राप्त कर सकता है?
क्या उद्यमी बिना रिश्वत के प्रतिस्पर्धा कर सकता है?
क्या ईमानदार अधिकारी बिना भय के वैध निर्णय ले सकता है?
क्या सार्वजनिक धन के उपयोग का प्रभावी हिसाब रखा जा सकता है?
क्या भ्रष्टाचार की जाँच प्रभाव और पद से परे होकर की जा सकती है?
क्या न्याय उचित समय में मिल सकता है?
क्या सामान्य नागरिक को विश्वास हो सकता है कि कानून शक्तिशाली और सामान्य व्यक्ति पर समान रूप से लागू होता है?
इन प्रश्नों के उत्तर भारत के विकास की वास्तविक गुणवत्ता निर्धारित करेंगे।
विकसित राष्ट्र वह है जहाँ संस्थाएँ अनिश्चितता पैदा करने के बजाय विश्वास पैदा करती हैं और जहाँ अवसर सत्ता के निकट होने के बजाय योग्यता, परिश्रम और नवाचार से निर्धारित होते हैं।
भ्रष्टाचार-विरोध से आगे: एक नई विकास-दृष्टि
भारत को भ्रष्टाचार को केवल एक ऐसी समस्या के रूप में नहीं देखना चाहिए जिसे कभी-कभी नियंत्रित करना है।
बड़ा लक्ष्य होना चाहिए—
संस्थागत ईमानदारी की संस्कृति का निर्माण।
इसका अर्थ है ऐसी व्यवस्था बनाना जिसमें ईमानदारी आसान हो, पारदर्शिता सामान्य हो, जवाबदेही विश्वसनीय हो, भ्रष्टाचार कठिन हो और नागरिकों की भागीदारी सार्थक हो।
भ्रष्टाचार विरोधी सोच को आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय स्थिरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, वैज्ञानिक विकास और मानव विकास के साथ जोड़ना होगा।
वास्तविक परिवर्तन तब होगा जब भ्रष्टाचार को "व्यवस्था का सामान्य हिस्सा" समझना बंद कर दिया जाएगा।
भ्रष्टाचार अपवाद होना चाहिए, अपेक्षा नहीं।
निष्कर्ष: हम कैसा भारत बनाना चाहते हैं?
भारत का भविष्य केवल आर्थिक आँकड़ों से निर्धारित नहीं होगा।
यह उन संस्थाओं की गुणवत्ता से निर्धारित होगा जो उन आर्थिक उपलब्धियों को नागरिक कल्याण में परिवर्तित करती हैं।
राष्ट्र तब मजबूत होता है जब नागरिक उसकी संस्थाओं पर विश्वास करते हैं।
राष्ट्र तब समृद्ध होता है जब सार्वजनिक संसाधनों का प्रभावी उपयोग होता है।
लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता जवाबदेह रहती है।
और राष्ट्र वास्तव में विकसित तब होता है जब अवसर भ्रष्टाचार, संपर्क या विशेषाधिकार पर नहीं, बल्कि योग्यता, परिश्रम और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा पर आधारित होते हैं।
इसलिए उद्देश्य केवल भ्रष्ट व्यक्तियों को पकड़ना नहीं होना चाहिए।
बड़ा उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना होना चाहिए जिसमें भ्रष्टाचार के अवसर कम हों, उसके सामाजिक प्रोत्साहन समाप्त हों, संस्थागत कमजोरियाँ दूर हों और नागरिक स्वयं भ्रष्टाचार को स्वीकार करने से इनकार करें।
भारत का विकसित राष्ट्र बनने का सपना तभी पूर्ण अर्थ प्राप्त करेगा जब वह स्वच्छ संस्थाओं, नैतिक शासन, निष्पक्ष अवसर, कुशल प्रशासन, जवाबदेह राजनीति और जिम्मेदार नागरिकता का भी सपना बने।
यह परिवर्तन रातोंरात नहीं होगा। इसके लिए निरंतर सुधार, संस्थागत साहस, तकनीकी नवाचार, जनभागीदारी, नैतिक नेतृत्व और पीढ़ीगत परिवर्तन की आवश्यकता होगी।
लेकिन इसकी शुरुआत आज हो सकती है।
लोक पद सार्वजनिक विश्वास है।
सार्वजनिक धन सार्वजनिक हित के लिए है।
सार्वजनिक शक्ति जवाबदेह होनी चाहिए।
और भ्रष्टाचार को विकास की कीमत कभी नहीं माना जाना चाहिए।
भारत की विकसित राष्ट्र बनने की यात्रा को केवल इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि वह कितना धन पैदा करता है, बल्कि इस बात से भी कि वह धन कितनी ईमानदारी से पैदा होता है, अवसर कितनी निष्पक्षता से वितरित होते हैं, सत्ता का उपयोग कितनी जिम्मेदारी से होता है और संस्थाएँ नागरिकों की कितनी निष्ठा से सेवा करती हैं।
भ्रष्टाचार के प्रति शून्य सहनशीलता केवल एक नारा नहीं है। यह एक आत्मविश्वासी, नैतिक, समृद्ध और वास्तव में विकसित भारत की विकास-दृष्टि का आधार बन सकती है।
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