एक पौधा पितरों के नाम

एक पौधा पितरों के नाम


रूपेश रंजन


एक पौधा लगाया था मैंने, 

बड़े प्रेम से, 

बड़े विश्वास से, 

सोचा था, 

धीरे-धीरे बड़ा होगा, 

मेरी आँखों के सामने, 

मेरे ही आकाश में।


फिर अचानक घर में मृत्यु ने दस्तक दी, 

कोई अपना चला गया, 

घर की दुनिया उजड़ गई, 

पितरों के कर्म-कांड में जाना पड़ा, और उस नन्हे पौधे की सुध कहीं पीछे छूट गई।


जिसे सींचने के लिए पानी चाहिए था, 

उसी दिन किसी अपने के लिए लकड़ियाँ जुटानी थीं, 

एक ओर पितरों को जल अर्पित करना था, 

दूसरी ओर एक पौधे की प्यास बुझानी थी।


मैं अपने पुरखों को तर्पण देता रहा, और इधर मेरा लगाया पौधा सूखता रहा, 

मैं किसी अपने की अंतिम विदाई में व्यस्त था, 

और मेरा एक सपना चुपचाप दम तोड़ता रहा।


कैसा विचित्र संयोग है इस जीवन का, 

एक को विदा करने में दूसरे को खो दिया, 

जिस धरती पर पितरों के लिए जल चढ़ाया, 

उसी धरती पर अपने पौधे को प्यासा छोड़ दिया।


अब किससे कहूँ यह दोहरा शोक, किसके सामने रखूँ यह अपराधबोध? 

एक अपना मनुष्यों की दुनिया से चला गया, 

एक अपना मिट्टी में ही जीवन हार गया।


जिस दिन मृत्यु के संस्कार निभा रहा था, 

उसी दिन जीवन का एक अंकुर मर रहा था। 

मैं पितरों को जल देने गया था श्रद्धा से, 

और मेरा पौधा जल की प्रतीक्षा में सूख गया था।


शायद जीवन का सबसे गहरा दुःख यही है— कभी-कभी किसी एक को विदा करते हुए, 

हम अनजाने में किसी दूसरे का जीवन भी खो देते हैं।

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