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तुझे पा रहा हूँ, या तुझे खो रहा हूँ....

ज़ंजीर-ए-ग़ुलामी को चूर-चूर कर दें।

जिस दिन मिलूँगा, सूद समेत वापिस लूँगा...

तुम जानते हो?

अलविदा

आरज़ू – एक नज़्म

प्यार यानी इंतज़ार

सुभाषचंद्र बोस और महात्मा गांधी : विचारों का अंतर, सम्मान का सामंजस्य

Subhas Chandra Bose and Mahatma Gandhi: Convergence of Respect in Divergence of Ideals

एक मौके पर सुभाषचंद्र बोस ने गांधीजी से अपने मतभेदो के बारे में कहा ।

कपड़ों से क्या ढकूँगा ख़ुद को,

*इस दुनिया में अगर कुछ भी ग़लत है

वो पल दे दे मुझे,

मौत भी कितनी हसींन और रवाँ लगती है,

कितने पास थे, कितने दूर हो गए,