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शून्य की खामोशी...

परिंदों जैसी चाहत थी कभी...

हर बार जब मैं उसे देखता हूँ...

पत्थरों के बीच बहता सा ये पानी...

हम तुम कितना कुछ कर सकते थे प्रेम में…

“घर नहीं आओगी, बेटी…

“घर नहीं आओगी, बेटी?”

“सही चुनाव”

“इंतज़ार की धड़कन”...

तेरी यादों की चादर ओढ़े जी रहा हूँ मैं...

मेरा अंग-अंग तड़पता है तेरी याद में...

तेरी यादों में हर पल जलता हूँ मैं...

तेरी चाहत का अंदाज़ क्या लिखूँ...

तू मेरी रूह में ऐसे बसी है जैसे सांसों में जान...

तू मेरी ज़िंदगी की बहार है...